VICHARAK VISHVAS AUR IMARATEN CLASS 12

VICHARAK VISHVAS AUR IMARATEN:विचारक, विश्वास और ईमारतें (सांस्कृतिक विकास) लगभग 600 ई. पू. 600 ई. तक।
अध्याय – 4


VICHARAK VISHVAS AUR IMARATEN: परिचय 

इस पाठ में हम जानेंगे 600 ई. पू. से 600 तक हुए विभिन्न सामाजिक, धार्मिक तथा निर्माण कलाओं हुए परिवर्तनों के बारे में। इसमें हम जानेंगे वैदिक धर्म में कुछ जटिलताओं के करन बौद्ध और जैन धर्मों का उदय हुआ। इन धामों ने बहुत से परिवर्तन लाये। वैदिक धर्म को बनाये रखने के लिए उनमे बहुत सी परिवर्तन किये गए।  उन्हीं परिवातों के बारे में जानेगे।
 
महत्वपूर्ण तथ्य (VICHARAK VISHVAS AUR IMARATEN)
  • महान दार्शनिक के विचार भौतिक और लिखित परम्पराओं में संग्रहित हुए तथा स्थापत्य और मूर्तिकला के माध्यम से अभिव्यक्त हुए।
  • बौद्ध धर्म के विश्वासों और विचारों को जानने का प्रमुख स्रोत है साँची का स्तूप। 
  • 19 वीं  शताब्दी में अंग्रेज व् फ्रांसीसियों ने साँची के स्तूप में विशेष दिलचस्पी दिखाई। 
  • आरम्भ में स्तूप वस्तुतः टीले होते थे। यह बोद्धो के लिए एक पवित्र स्थल होता था, यहाँ आंगन के बिच चबूतरों पर बुद्ध से जुड़े अवसेसों को गाड़ा जाता था। 
  • साँची के स्तूप के संरक्षण में भोपाल की शासिकाओं शाहजहाँ बेगम और सुल्ताना जहाँ बेगम का बहुत योगदान था। शाहजहाँ बेगम ने यूरोपियों को केवल स्तूप के तोरण द्वार की प्लास्टर प्रतिकृति ही ले जाने दी। सुल्ताना जहाँ बेगम ने इस स्तूप के रख-रखाव के लिए धन दिए तथा यहाँ संग्राहलय और अतिथिशालय का निर्माण भी कराया। 
  • ई. पूर्व प्रथम सहस्त्राब्दी में जीवन के रहस्यों को समझने के लिए जरथुस्त्र, खुंगत्सी, सुकरात, प्लेटो, अरस्तु, महाबीर और बुध आदि चिंतकों का उदय हुआ। 
  • पूर्व  वैदिक परंपराओं के ऋग्वेद में अग्नि, इंद्र, सोम अदि देवताओं की स्तुति है तथा यज्ञों का विशेष महत्व दर्शाया गया है। 
    बुद्ध और महावीर जैसे चिंतकों ने वेदों पर प्रश्न उठाया और जीवन का अर्थ तथा पुनर्जन्म आदि के बारे में जानने का प्रयास किया। 
  • बुद्ध की शिक्षाओं का संकलन त्रिपिटक में है जिसमे तीन पिटक सम्मिलत है, सुत्तपिटक, विनयपिटक और अभिधम्म पिटक। 
    जैन धर्म में पाँच प्रमुख व्रत है- सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य। 
  • जैन विद्वानों ने प्राकृत, संस्कृत और तमिल भाषाओँ में अपना साहित्य का सृजन किया। 
  • भगवान बुध  के संदेस सैकड़ों वर्षों के दौरान पुरे उपमद्वीप में और उसके बाद मध्य ऐसिया होते हुए चीन कोरिया और जापान, श्रीलंका से समुद्र पार कर म्यांमार, थाईलैंड और इंडोनेशिया तक फैला। 
  • बुद्ध के शिष्यों के दल ने संघ की स्थापना की। बुद्ध के अनुयायी विभिन्न सामाजिक वर्ग के थे किन्तु संघ में आने के बाद सभी को बराबर माना जाने लगा। 
  • बुद्ध की मौसी महाप्रजापति गौतमी संघ में आने वाली प्रथम भिक्षुणी थी। ऐसी स्त्रियां जो संघ में आयी वे धम्म की उपदेशिकाएँ बानी। भविष्य में वे थेरी बनी, जिसका अर्थ है ऐसी महिलाएं जिन्हों ने निर्वाण प्राप्त कर लिए है। 
  • बौद्ध संघ में समाहित होने पर सभी को बराबर माना जाता था क्योंकि भिक्खू और भिक्खुनी बनने पर उन्हें अपनी पुराणी पहचान का त्याग करना पड़ता था। 
  • बौद्ध धर्म में निर्वाण का अर्थ है, अंह और इच्छा का समाप्त होना। 
  • वैष्ण्व धर्म हिंदू धर्म की वह परंपरा थी जिसमे विष्णु को सर्वाधिक महत्वपूर्ण देवता मानी जाती थी। 
  • शैव परंपरा में शिव को सर्वोच्या परमेश्वर माना गया। 
  • महिलाएं और सूद्र वैदिक साहित्य पढ़ने सुनने से वंचित थे जबकि वे पुराणों को सुन सकते थे।

एक अंकीय महत्वपूर्ण प्रश्न (VICHARAK VISHVAS AUR IMARATEN)

1 राहुल सांकृत्यायन को त्रिपिटकाचार्य की उपाधि किसने दी थी?
(a) स्वामी विवेकानंद ने 
(b) विद्यालंकार विहार ने
(c) महात्मा गाँधी ने 
(d) राम कृष्ण परमहंस ने 

2 वैदिक काल कब से कब तक मानी जाती है?
(a) 1500 ई.पू. से 600 ई.पू. तक
(b) 1500 ई.पू. से 1000 ई.पू. तक
(c) 1500 ई.पू. से 500 ई.पू. तक
(d) 1200 ई.पू. से 600 ई.पू. तक

3 ऋग्वैदिक काल कब से कब तक मानी जाती है?
(a) 1500 ई.पू. से 1000 ई.पू. तक
(b) 1500 ई.पू. से 600 ई.पू. तक
(c) 1000 ई.पू. से 600 ई.पू. तक
(d) 1100 ई.पू. से 600 ई.पू. तक

4 वैदों की संख्या कितनी है?
(a) 3
(b) 4
(c) 5
(d) 8

5 सबसे प्राचीनतम वैद कौन-सी है?
(a) अथर्ववेद 
(b) यजुर्वेद 
(c) सामवेद 
(d) ऋग्वैद

6 ऋग्वैदिक काल का प्रमुख देवता कौन था?
(a) इन्द्र
(b) ब्रह्मा 
(c) शिव 
(d) विष्णु 

7 ऋग्वैद को कितने मंडलों में विभक्त किया गया है?
(a) 20 मंडल
(b) 10 मंडल
(c) 5 मंडल
(d) 18 मंडल

8 ऋग्वैद में कुल कितने सूक्त है?
(a) 1750
(b) 2200
(c) 925
(d) 1028

9 भारतीय संगीत का जनक किस वैद को माना जाता है?
(a) संगीत्वेद को 
(b) सामवेद को
(c) ऋग्वेद 
(d) अथर्ववेद

10 गायत्री मंत्र किस वैद से ली गयी है?
(a) ऋग्वैद से
(b) धनुर्वेद
(c) आयुर्वेद
(d) अथर्ववेद

11 पुराणों की संख्या कितनी है?
(a) 15
(b) 16
(c) 17
(d) 18

12 सबसे प्राचीनतम पुराण कौन-सा है?
(a) वायुपुराण
(b) मतस्यपुराण
(c) विष्णुपुराण
(d) नारदपुराण 

13 जैन धर्म का संस्थापक कौन है?
(a) महावीर स्वामी
(b) भगवान् बुद्ध 
(c) पार्श्वनाथ 
(d) ऋषभ देव 

14 जैन धर्म का प्रथम तीर्थकर कौन थे?
(a) महावीर स्वामी 
(b) ऋषभ देव
(c) गोतम बुद्ध 
(d) ऋषभदेव

15 जैन धर्म के 23वें तीर्थकर कौन थे?
(a) पार्श्वनाथ
(b) ऋषभ देव
(c) गोतम बुद्ध 
(d) सिद्धार्थ

16 महावीर स्वामी का जन्म कब हुआ था?
(a) 532 ई.पू.
(b) 540 ई.पू.
(c) 563 ई.पू.
(d) 512 ई.पू.

17 महावीर स्वामी का निर्वाण कब हुआ था?
(a) 412 ई.पू.
(b) 450 ई.पू.
(c) 468 ई.पू.
(d) 480 ई.पू.

18 महावीर स्वामी का जन्म कहाँ हुआ था?
(a) कुंडग्राम में
(b) वैशाली में 
(c) कुशीनगर में 
(d) श्रवणबेलगोला में 

19 महावीर स्वामी के पिता और माता का नाम क्या था?
(a) सिद्धार्थ और यसोदा
(b) वर्धमान और त्रिशला
(c) सिद्धार्थ और त्रिशला
(d) सिद्धार्थ और अनोज्या

20 महावीर स्वामी के पत्नी का नाम क्या था?
(a) यशोधरा
(b) प्रियदर्शना 
(c) यशोदा
(d) देवी 

20 महावीर स्वामी का निर्वाण कहाँ हुआ था?
(a) कुंडग्राम
(b) कुशीनगर 
(c) पावा में
(d) पारसनाथ 

20 महावीर स्वामी के पुत्री का नाम क्या था?
(a) संगमित्रा 
(b) रुपमानी
(c) अणोज्या
(d) लक्ष्मणा

21 बौद्ध धर्म का संस्थापक कौन है?
(a) गौतम बुद्ध
(b) महावीर स्वामी 
(c) जीवक 
(d) अशोक 

22 बुद्ध का निर्वाण कब हुआ था?
(a) 583 ई.पू.
(b) 563 ई.पू.
(c) 483 ई.पू.
(d) 380 ई.पू.

23 बुद्ध का जन्म कहाँ हुआ था?
(a) बोधगया 
(b) सारनाथ
(c) कुशीनगर 
(d) लुम्बनी

24 गौतम बुद्ध के बचपन का नाम क्या था?
(a) गौतम 
(b) अस्सागी
(c) वर्धमान
(d) सिद्धार्थ

25 गौतम बुद्ध के पिता का नाम क्या था?
(a) राहुल
(b) यशोबर्मन 
(c) शुद्धोधन
(d) सिद्धार्थ

26 गौतम बुद्ध के माता का नाम क्या था?
(a) पद्मावती 
(b) पुलोमी 
(c) गोतमी 
(d) महामाया

27 बुद्ध का जन्म कब हुआ था?
(a) 580 ई.पू.
(b) 563 ई.पू.
(c) 540 ई.पू.
(d) 463 ई.पू.

28 प्रथम जैन संगीति कब हुआ था?
(a) 300 ई.पू. में
(b) 350 ई.पू. में
(c) 251 ई.पू. में
(d) 101 ई.पू. में

29 गौतम बुद्ध के पत्नी का नाम क्या था?
(a) यशोदा 
(b) यशोधरा
(c) प्रभावती 
(d) देवी 

30 गौतम बुद्ध के पुत्र का नाम क्या था?
(a) शम्भ 
(b) राहुल 
(c) विजय 
(d) गौरव 

31 गौतम बुद्ध का निर्वाण कहाँ हुआ था?
(a) वैशाली 
(b) बोधगया 
(c) सारनाथ 
(d) कुशीनगर

32 भगवान बुद्ध ने प्रथम उपदेश कहाँ दिये?
(a) कुशीनगर
(b) सारनाथ
(c) बोधगया 
(d) राजगृह

33 बौद्धों का धार्मिक ग्रंथ क्या है?
(a) त्रिपिटक
(b) दिव्यप्रबंधम 
(c) भाग्वतिसुत्र 
(d) बोधसंहिता 

34 साँची की स्तूप की खोज कब और किसने की?
(a) 1818 ई. में तिफेन्थेलर ने
(b) 1818 ई. में जनरल टेलर ने
(c) 1820 ई. में जनरल टेलर ने
(d) 1920 ई. में जॉन मार्शल ने

35 साँची मध्यप्रदेश के किस जिले में स्थित है?
(a) सागर 
(b) इंदौर 
(c) रायसेन
(d) भोपाल 

36 सल्लेखन द्वारा मृत्यु का विधान किस धर्म में है?
(a) जैन धर्म में
(b) बोद्ध धर्म 
(c) सनातन धर्म 
(d) पारसी धर्म 

37 महात्मा बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति कहाँ हुयी?
(a) कुशीनगर 
(b) सारनाथ 
(c) बौद्धगया
(d) श्रवणबेलगोला

38 श्वेताम्बर एवं दिगम्बर का संबंध किस धर्म से है?
(a) बौद्ध धर्म
(b) ईसाई धर्म 
(c) जैन धर्म 
(d) वैदिक धर्म 

39 वीर शैव (लिंगायत) आंदोलन का जनक कौन है?
(a) पुष्यमित्र सुंग 
(b) मखलीगोसाल
(c) परशुराम
(d) बास बन्ना

40 हावीर स्वामी की पुत्री अणोज्या प्रियदर्शना का विवाह किससे हुआ था?
(a) कामिल से 
(b) जामलि से
(c) कारतूस से 
(d) अस्सागी से 

VICHARAK VISHVAS AUR IMARATEN: Important Question Answer

प्रश्न: शालभंजिका क्या है?
उत्तर: स्तूपों के स्तम्बों एवं निचे की बड़ेरी के कोनों पर नारी रूपी मूर्तियों का निर्माण किया गया है। यह मूर्ति युवा नग्न स्त्री की है जो शाल की पेड़ की शाखा पकड़े लटकी है। काफी प्रयासों के पश्चात विद्द्वानों ने इस स्त्री की मूर्ति को संस्कृत साहित्य में वर्णित शालभंजिका की मूर्ति माना है। लोक परंपरा के अनुसार शालभंजिका द्वारा छुए जाने मात्रा से शाल के वृक्षों में फल एवं फूल खिल उठाते है। यह एक सुबह स्त्री का प्रतिक होने के कारन स्तूपों में इसका निर्माण करवाया जाता था।

प्रश्न: त्रिपिटक क्या है?
उत्तर: त्रिपिटक का शाब्दिक अर्थ है- तीन टोकरियाँ जिनमे की पुस्तक रखी जाती है। बुद्ध के मृत्युं के पश्चात् उनके अनुयायियों ने उनकी शिक्षाओं का संकलन तीन पिटकों सुत्तपिटक, विनयपिटक और अभिधम्मपिटक में किया। इन्हें संयुक्त रूप से त्रिपिटक कहा जाता है। ये बौद्धों का धार्मिक ग्रन्थ है।

प्रश्न: चैत्य क्या है?
उत्तर: बौद्ध भिक्षुओं के शवदाह के पश्चात् उनके शरीर के कुछ अवशेष टीलों पर सुरक्षित रख दिए गए। अंतिम संस्कार से जुड़ें ये टीलें चैत्य कहलायें। यह अनेकानेक पायों पर खड़ा एक बड़ा हॉल जैसा होता था। यह बौद्ध मंदिर भी कहलाता था। सबसे प्रशिद्ध चैत्य कार्ले का चैत्य है जो महाराष्ट्र के पुणे जिले में स्थित है।

प्रश्न: विहार क्या है?
उत्तर: विहार भिक्षुओं का निवास स्थल होता था। वर्षाकाल में बौद्ध भिक्षु यहाँ सरन लेते थे। इसमें एक केंद्रीय शाला होती थी जिसमे सामने बरामदे की ओर एक द्वार रहता था। प्रायः विहार का निर्माण चैत्यों के सामने कराया जाता था। 

VICHARAK VISHVAS AUR IMARATEN CLASS 12 महत्वपूर्ण प्रश्न और उत्तर :

प्रश्न: आपके अनुसार स्त्री-परुष संघ में क्यों जाते थे?
उत्तर: स्त्री-पुरुष के संघ में शामिल होने के निम्नलिखित कारन थे:-
( क ) वे बुद्ध के शिक्षाओं से प्रभावित थे।
( ख) वे बौद्ध धर्म की शिक्षाओं का प्रचार करना चाहते थे।
( ग ) कई स्त्रियाँ बौद्ध धर्म की उपदेशिका बन गयी थी।
( घ ) वे थेरी बनाना चाहती थी अर्थात निर्वाण प्राप्त करना चाहती थी।
( ड़ ) वे प्रचलित वैदिक धर्म की प्रथा से खुश नहीं थे और उसे समाप्त करना चाहते थे।

प्रश्न: साँची के स्तूप के संरक्षण में भोपाल की बेगमों की भूमिका की चर्चा कीजिये।
उत्तर: साँची के स्तूप के संरक्षण में भोपाल की बेगमों की निम्नलिखित भूमिका थी:
( क ) भोपाल के शासिकाओं, शाहजहाँ बेगम और उनकी उत्तराधिकारी सुल्तानजहाँ बेगम की साँची के स्तूप के संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने प्राचीन स्तूप के रख-रखाव के लिए धन का अनुदान किया।
( ख ) यही नहीं जब जॉन मार्शल ने साँची के स्तूप पर विस्तृत ग्रन्थ लिखा तो इसके प्रकाशन में सुल्तानजहाँ बेगम ने अनुदान दिया। इसलिए जॉन मार्शल ने अपने महत्वपूर्ण ग्रंथों को सुल्तानजहाँ को समर्पित किया।
( ग ) सुल्तानजहाँ बेगम ने वहाँ पर एक संग्रहालय और अतिथिशाला बनाने के लिए भी दान दिया।
( घ ) अँग्रेज और फ्रांसीसी दोनों साँची के स्तूप द्वारों को यूरोप ले जाना चाहते थे लेकिन उन्होंने उन्हें प्लास्टर ऑफ़ पेरिस की अनुकृति देकर संतुष्टि कर दिया। और इस तरह भोपाल की बेगमों के प्रयास से साँची का स्तूप सुरक्षित रहा और किसी अन्य के हाथ में नहीं जा सका।

प्रश्न: स्तूप क्यों और कैसे बनाये जाते थे? चर्चा कीजिये।
उत्तर: स्तूप बौद्ध बिक्षुओं के लिए एक पवित्र स्थल होता है क्योंकि इन स्थानों पर महात्मा बुद्ध की स्थियाँ या उससे सम्बंधित वस्तुओं को रखी गयी है। इन टीलों को स्तूप कहा जाता है। इन स्तूपों की बुद्ध या बुद्धमत के चिह्नों के रूप में पूजा की जाती थी। अशोकवादाना से ज्ञात होता है की अशोक ने सभी प्रसिद्द नगरों में स्तूप बनाने का आदेश दिया था।
स्तूप निर्माण की विधि: इन स्तूपों का निर्माण दान द्वारा किया गया था। दान देने वालों में राजा, शिल्पकार और व्यापारी आदि शामिल थे। इसमें कुछ पुरुष, महिलाएँ, भिक्षुओं और भिक्षुणियाँ भी शामिल थे। आरम्भ में स्तूप अर्द्धगोलाकार रूप में जमी मिटटी होती थी। इसे अण्ड भी कहा जाता था। आगे चलकर इसमें बहुत वस्तुएँ जोड़ें गए। यह चकोर- गोल आकारों का मिश्रण होता था। अण्ड एक ऊपर छज्जे जैसी आकृति बनाने लगी थी जिसे हर्मिका कहा जाता था, इसे देवताओं का निवास स्थल माना जाता था। हर्मिका से एक मस्तूल निकलता था जिसे यष्टि कहते थे। स्तूप के चरों और वेदिका होती थी। साँची और भरहुत के स्तूपों से तोरणद्वार और वेदिकाएँ प्राप्त हुयी है।

प्रश्न: प्रारंभिक भारतीय काल में मंदिर वास्तुकला के विकास का वर्णन करें।
उत्तर: प्रथम मंदिरों का निर्माण लगभग उसी समय प्रारम्भ हुआ जब साँची जैसे जगहों पर स्तूपों का निर्माण हुआ।
चौकोर कमरा: आरंभिक मंदिरों में एक छोटा- चौकोर कमरा होता था, जिसे ‘गर्भगृह’ कहा जाता था और इसमें किसी देवी या देवता की प्रतिमा होती थी। कमरे में एक ही द्वार होता था जिससे होकर श्रद्धालु प्रवेश करते थे और अपनी पूजा करते थे।
शिखर: धीरे- धीरे मंदिरों की बनावट में परिवर्तन हुआ, मध्य मंदिर के ऊपर एक विशाल आकृति, जिसे शिखर के रूप में जाना जाता है, का विकाश हुआ।
भित्त चित्र: मंदिरों की दीवारों को सुन्दर चित्रित नक्काशियों द्वारा सजाया गया।
सभास्थल, तोरण एवं जल आपूर्ति: बाद में मंदिरों को भी बड़े बनाये जाने लगे। बड़े कक्ष, बड़ी दीवारें, भव्य दरवाजें और यहाँ तक की उनमें जल प्राप्ति की उचित व्यवस्था की गयी थी।
पहाड़ियाँ काट कर निर्माण: प्रारम्भ में कुछ मंदिरों का निर्माण पहाड़ियों को काट कर खोखला कर के कृत्रिम गुफाओं के रूप में भी बनाया गया। जहाँ पूजा करने वाले अपनी पूजा- अर्चना करते थे। बाद में इन्हे काटकर पूर्ण रूप से एक वृहत मंदिर के रूप में परिवर्तित कर दिया गया, जैसे कैलाशनाथ का मंदिर, अजंता और एलोरा के गुफा मंदिर इसी कला के अनुपम उदहारण हैं।

VICHARAK VISHVAS AUR IMARATEN CLASS 12 महत्वपूर्ण प्रश्न और उत्तर :

प्रश्न: भगवन बुद्ध के मध्यम मार्ग ( अष्टांगिक मार्ग ) का वर्णन करे। या, बुद्ध के अनुसार माध्यम मार्ग क्या है? समीक्षा करें।
उतर: गौतम बुद्ध ने इस संसार को दुःखमयी बताया तथा इस दुःख से बचने के लिए मध्यम मार्ग का ज्ञान दिया। इसी मध्यम मार्ग को ही अष्टांगिक मार्ग कहाँ गया। ये अष्टांगिक मार्ग निम्नलिखित है:
1. सम्यक दृष्टि – चार आर्य सत्यों की सही परख।
2. सम्यक वाणी – धर्मसंगत एवं मृदु वाणी का प्रयोग।
3. सम्यक संकल्प – भौतिक वास्तु एवं दुर्भावना का त्याग।
4. सम्यक कर्म – अच्छा काम करना।
5. सम्यक आजीव – सदाचारी जीवन जीते हुए ईमानदारी से आजीविका कमाना।
6.सम्यक व्यायाम – विवेकपूर्ण प्रयत्न एवं शुद्ध विचार ग्रहण करना।
7. सम्यक स्मृति – अपने कर्मों के प्रति विवेक तथा सावधानी को सदैव स्मरण रखना। अर्थात मन, वचन और कर्म के प्रत्येक क्रिया के प्रति सचेत रहना।
8. सम्यक समाधी – चित्त की समुचित एकाग्रता जिससे ज्ञान प्राप्त हो सके। लोभ, द्वेष, आलस, बीमारी एवं अनिश्चय की स्थिति से दूर रहने के उपाय करना ही सम्यक समाधी है।

प्रश्न: महावीर स्वामी का जीवन परिचय दें।
उत्तर: महावीर स्वामी जैन धर्म के 23वें तीर्थकर थे। महावीर स्वामी ने ही जैन धर्म का विस्तार किया, इस कारन महावीर स्वामी को जैन धर्म का संस्थापक माना जाता है। इनका जन्म 540 ई. पू. वैशाली के कुंडग्राम में हुआ था। इनका वास्तविक नाम वर्द्धमान था। इनके पिता सिद्धार्थ थे जो एक क्षत्रिय थे। इनकी माता का नाम त्रिशला थी। राजकुमारी यशोदा इनकी पत्नी थी। इनकी पुत्री का नाम अणोज्या था जिसे प्रियदर्शना भी कहा जाता था। महावीर स्वामी ने 30 वर्ष की आयु में गृह त्याग कर सन्यासयियों की तरह अपना जीवन व्यतीत करने लगे। लम्बे समय तक तपश्या करने के पश्चात् उन्होंने समस्त इन्द्रियों पर विजय प्राप्त की और तब से वें ‘जीन’ कहलाये तथा उनके अनुयायी ‘जैन’ कहलाये। 468 ई. पू. महावीर स्वामी का निर्वाण 72 वर्ष की आयु में पावा में हुयी थी।

प्रश्न: जैन धर्म के उपदेशों एवं सिद्धांतों का वर्णन करे।
उत्तर: महावीर स्वामी जैन धर्म के 24वें तीर्थकर थे। महावीर स्वामी का जैन धर्म के विस्तार में सबसे ज्यादा योगदान रहा। इस कारन ही महावीर स्वामी को जैन धर्म का संस्थापक माना जाता है। इन्होंने इस धर्म के लिए जो उपदेश दिए वही इस धर्म का सिद्धांत बन गए जो की निम्नलिखित है:

महावीर स्वामी के 5 महाव्रत:
1. सत्य या अमृषा- हमेशा सत्य बोलना।
2. अहिंसा- कभी हिंसा न करना और न ही किसी का दिल दुखाना।
3. अस्तेय- कभी चोरी न करना। किसी का सामान देखकर लालच करना भी चोरी है।
4. अपरिग्रह- सम्पति का संग्रह न करना।
5. ब्रह्मचर्य- अपने सभी इन्द्रियों को बस में रखो।
जैन धर्म के सिद्धांत:
1. ईश्वर में अविश्वास- महावीर स्वामी ईश्वर को नहीं मानते थे। उनके अनुसार न ही ईश्वर इस संसार के रचयिता है और न ही नियंत्रक।
2. आत्मा का अस्तित्व- महावीर स्वामी आत्मा के अस्तित्व को मानते थे। उनके अनुसार प्रत्येक जीव, पेड़, पौधे  सभी में आत्मा होती है।
3. कर्मफल एवं पनर्जन्म- महावीर स्वामी पुनर्जन्म के सिद्धांत को मानते थे। कर्मफल ही जन्म – मृत्यु का कारन है। आवागमन का सिद्धांत मनुष्य के कर्म पर आधारित है।
4. मोक्ष अथवा निर्वाण- सांसारिक तृष्णा बंधन से मुक्ति को निर्वाण कहा गया। कर्म-फल से मुक्ति पाकर ही व्यक्ति मोक्ष अथवा निर्वाण की ओर अग्रसर हो सकता है। महावीर स्वामी ने कर्मफल से छुटकारा पाने के लिए त्रिरत्न के बारे में बताते है:
1. सम्यक ज्ञान- सच्चा और पूर्ण ज्ञान ही सम्यक ज्ञान कहलाता है।
2. सम्यक दर्शन- सत्य में विश्वास एवं यथार्थ ज्ञान के प्रति श्रद्धा ही सम्यक दर्शन है।
3. सम्यक आचरण- सच्चा आचरण एवं सांसारिक विषयों से उत्पन्न सुख-दुःख के प्रति संभव ही सम्यक आचरण है। 

प्रश्न: महात्मा बुद्ध के जीवन और शिक्षाओं की विवेचना करें।
उत्तर: गौतम बुद्ध का बचपन का नाम सिद्धार्थ था। उनका जन्म 563 ई. पू. पूर्वोत्तर बिहार में कपिलवस्तु के निकट नेपाल की तराई में लुम्बनी ग्राम के आम्रकुंज में हुआ था। उनका वास्तविक नाम सिद्धार्त था। उनके पिता का नाम शुद्धोधन तथा माता का नाम महामाया थी। बुद्ध के जन्म के सातवें दिन ही इनके माता की मृत्यु हो गयी। इनका लालन-पालन इनकी मौसी महाप्रजापति गौतमी ने किया। बुद्ध को बचपन में ही देख कर कालदेव तथा कौडिन्य ने यह भविष्यावाणी की थी की वह एक सन्यासी बनेगा। बुद्ध बचपन से ही चिंतनशील थे। 16 वर्ष के उम्र में ही उनका विवाह एक सुंदरी कन्या यशोधरा कर दी गयी। उनका एक पुत्र भी हुआ जिसका नाम राहुल था। बुद्ध अपने पारिवारिक जीवन से कुश नहीं थे, क्योंकि वह सन्यासी जीवन जीना चाहते थे। बहार के चार दृश्य उनके मन को बहुत विचलित कर रहा था, 1. एक जर्जर शरीर वाला वृद्ध, 2. एक रोगग्रस्त व्यक्ति, 3. एक मृत व्यक्ति, 4. एक प्रशन्न मुद्रा में भ्रमणशील सन्यासी जो सांसारिक मोहों से मुक्त प्रसन्नचित्त था। प्रथम के तीन दृश्यों को देखकर बुद्ध ने इस संसार को दुःखमयी बताया तथा चौथा दृश्य से प्रभावित होकर सन्यासी बनाने का निश्चय किया। बुद्ध ने 29 वर्ष की आयु में गृह का त्याग कर दिया और ज्ञान की प्राप्ति के लिए जंगल की और जल दिए। लम्बे समय तक भ्रमण और तपस्या के पश्चात् भी उन्हें ज्ञान की प्राप्ति नहीं हुयी। एक बार गौतम बुद्ध गया में निरंजना नदी के किनारे एक पीपल एक पीपल वृक्ष के निचे दृढ़ निश्चय के साथ बैठ गए की अब ज्ञान की प्राप्ति कर के ही उठेंगे। आठवें दिन बैशाख पूर्णिमा को उन्हें ज्ञान की प्रति हुयी और वह बुद्ध कहलायें। बुद्ध के सिद्धांत एवं शिक्षाएँ निम्नलिखित है:
भगवान बुद्ध चार आर्य सत्य के बारें में बतातें है:
1. दुःख – भगवन बुद्ध ने इस संसार को दुःखमयी बताया। उनके अनुसार यह पूरा संसार दुखों से भरी है।
2.दुःख समुदाय – समुदाय का अर्थ है कारन। बुद्ध का अनुसार सभी दुखों का कारन मनुष्य की लालसा है जिसकी पूर्ति न होने से उन्हें कष्टों का सामना करना पड़ता है। अधूरी इच्छओं को पाने के लिए ही मुष्य को बार- बार जन्म लेना पड़ता है।
3. दुःख निरोध – सभी दुखों के निवारण के लिए दुखों तृष्णा का उन्मूलन आवश्यक होता होता है।
4. दुःख निरोध मार्ग – भगवान बुद्ध ने दुखों के निरोध के लिए माध्यम मार्ग अथवा अष्टांगिक मार्ग के पालन पर बल दिया।
भगवान बुद्ध के द्वारा दुःख निरोध के लिए बतायें माध्यम मार्ग निम्नलिखित है:
1. सम्यक दृष्टि – चार आर्य सत्यों की सही परख।
2. सम्यक वाणी – धर्मसम्मत एवं मृदु वाणी का प्रयोग।
3. सम्यक संकल्प – भौतिक वस्तुओं एवं दुर्भावन का त्याग।
4. सम्यक कर्म – अच्छा काम करना।
5. सम्यक आजीव – सदाचारी जीवन जीते हुए ईमानदारी से जीविका कामना।
6. सम्यक व्यायाम – विवेकपूर्ण प्रयत्न एवं शुद्ध विचार ग्रहण करना। अशुद्ध विचारों को त्यागते रहना।
7. सम्यक स्मृति – मन, वचन, कर्म के प्रत्येक क्रिया के प्रति सचेत रहना।
8. सम्यक समाधी – चित्त की समुचित एकाग्रता जिससे ज्ञान प्राप्त हो सके।
भगवन बुद्ध ने नैतिक जीवन जीने के लिए 10 शील तथा आचरण के बारे में बताते है: 1.अहिंसा, 2.सत्य, 3.अस्तेय, 4.अपरिग्रह, 5.ब्रह्मचर्य, 6.नृत्य व सगीत का त्याग, 7.सुगनद्धित पदार्थों का त्याग, 8.असमय भोजन का त्याग, 9.कोमल शय्या का त्याग, 10.कामिनी कंचन का त्याग। 

प्रश्न: जैन धर्म तथा बौद्ध धर्म में क्या समानताएँ थी?
उत्तर: जैन तथा बौद्ध दोनों धर्मों का उदय छठी सदी ई पू  में हुआ। दोनों ही धर्मों का उदय वैदिक धर्म के भोग-विलास, सतीप्रथा, ऊंच – नीच तथा अन्य जटिलताओं के कारन हुआ था। इस कारन दोनों धर्मों में कई समानताएँ थी, जो की निम्नलिखित है:
1. दोनों ही अनीश्वरवादी थे अर्थात दोनों दी धर्मों ने ईस्वर की अस्तित्व हो नहीं माना।
2. दोनों वैदिक यज्ञ – कर्मकांड का विरोध करते थे।
3. दोनों ही अपने उपदेश जनभाषा प्राकृत एवं पाली में देते थे। 
4. दोनों धर्मों के प्रवर्तक महावीर स्वामी एवं गौतम बुद्ध क्षत्रिय थे।
5. जाती – प्रथा का दोनों धर्मों में कोई स्थान नहीं था।
6. दोनों धर्मों में संसार को दुःखमय कहा एवं कर्म के नाश द्वारा आवागमन चक्र से मुक्ति का मार्ग बताया।

VICHARAK VISHVAS AUR IMARATEN CLASS 12 महत्वपूर्ण प्रश्न और उत्तर :

प्रश्न: जैन तथा बौद्ध धर्म के बिच असमानताओं का वर्णन करे।
उत्तर: जैन तथा बौद्ध दोनों धर्मों का उदय छठी सदी ई पू  में हुआ। दोनों ही धर्मों का उदय वैदिक धर्म के भोग-विलास, सतीप्रथा, ऊंच – नीच तथा अन्य जटिलताओं के कारन हुआ था। फिर भी दोनों धर्मों में कई असमानताएँ थी, जो की निम्नलिखित है:
1. अहिंसा – दोनों धर्म अहिंसावादी है लेकिन बौद्धों की तुलना में जैन धर्म द्वारा अहिंसा पर अत्यधिक बल दिया गया।
2. निर्वाण – जैन धर्म में निर्वाण का अर्थ है सिद्धांत व्यवस्था में शरीर का त्याग। बौद्ध धर्म के अनुसार निर्वाण इसी जन्म में प्राप्त हो सकता है, लेकिन महापरिनिर्वाण मृत्यु के बाद ही संभव है।
3. आत्मा का स्वरूप – दोनों ही धर्मों में आत्मा के अस्तित्व को स्वीकारा है। जैनों के अनुसार आत्मा अनश्वर है और यह बार- बार जन्म लेती है। जबकि बौद्ध धर्म के अनुसार आत्मा देह के साथ नष्ट हो जाती है। आत्मा पुनर्जन्म नहीं लेती बल्कि पहला जन्म दूसरे जन्म का कारन बनती है।
4. त्यागपूर्ण जीवन – जैन धर्म में निर्वाण प्राप्ति के लिए कठोर तपस्या पर दिया, जबकि जैन धर्म में माध्यम मार्ग को अपनाया।
5. धर्म का प्रसार – जैन धर्म भारत के सिमा के बहार नहीं फ़ैल सका, जबकि बौद्ध धर्म का विस्तार भारत के साथ – साथ एशिया के और भी कई देशों में हुआ। इसका प्रमुख कारन इसकी सरल एवं सहज सिद्धांत थी।

प्रश्न: बौद्ध धर्म के प्रचार एवं विस्तार के प्रमुख कारणों का वर्णन करे।
उत्तर: 6ठी सदी ई पू  में बौद्ध धर्म का उदय हुआ। यह धाम केवल भारत में ही नहीं बल्कि एशिया के अन्य कई देशों तक फैला। इसके संस्थापक मवीर स्वामी थे। महावीर स्वामी के छोटे से मत ने वैश्विक धर्म का रूप ले लिया। इसके कई कारन थे, जिसमे प्रमुख कारन निम्नलिखित है:
1. तत्कालीन धार्मिक स्थिति – 6 ठी सदी ई पू वैदिक धर्म कई दोष एवं जटिलताएँ उत्पन्न हुयी, जिससे लोग त्रस्त हो गए थे। ऐसे समय में बौद्ध धर्म का उदय हुआ जो बहुत सहज एवं सरल थी। इस कारन लोग इस धर्म की और आकर्षित हुए।
2. बुद्ध का व्यक्तित्व – बुद्ध का सरल व्यक्तित्व, सहजता, अकाट्य तर्क एवं उनका प्रभावशाली तर्क इस धर्म के विस्तार का प्रमुख कारन बना।
3. सरल सिद्धान- बौद्ध धर्म में माध्यम मार्ग पर विशेष जोर दिया गया। इस धर्म की सिद्धांत बहुत सरल थी। लोग सरलता ये इस धर्म के सिद्धांतों का पालन कर सकते थे।
4. सामाजिक समानता – बौद्ध धर्म में जाती व्यवस्था का कोई स्थान नहीं था। सभी को सामान दर्जा दिया गया। ऊंच-नीच की भावना को समाप्त किया गया।
5. जानभाषा का प्रयोग – बुद्ध ने अपने उपदेश एवं इस धर्म का प्रचार – प्रसार के लिए जान भाषा का प्रयोग किया। इससे बौद्ध धर्म के अनुयायिओं में बहुत अधिक वृद्धि हुयी।
6. बौद्ध संघ का योगदान – बुद्ध ने इस धर्म के प्रचार एवं प्रसार के बोध संघ की स्थापना की थी।
7. राजकीय संरक्षण – बौद्ध धर्म के विस्तार का एक प्रमुख करण राजकीय संरक्षण भी है। बिम्बिसार, उदयिन, अशोक, अनिष्क एवं हर्षवर्धन आदि राजाओं ने इस धर्म को राजकीय संरक्षण दिया। कुछ सशकों ने बौद्ध कर्म को राजकीय धर्म घोषित कर इस धर्म के विस्तार में अहम् भूमिका निभाई। 

प्रश्न: बौद्ध धर्म के पतन के प्रमुख कारणों का वर्णन करें?
उत्तर: बौद्ध धर्म का पतन गुप्तकाल के बाद देखने को मिलती है। बौद्ध धर्म के पतन के प्रमुख कारन निम्नलिखित है:
( क ) बौद्ध धर्म का परिवर्तित स्वरूप – कालांतर में बौद्ध धर्म के मूल स्वरूप में ह्रास हुयी। इसमें धर्म में भी मूर्ति पूजा आरम्भ हुयी। जादू, टोन-टोटके को बढ़ावा मिला। इस धर्म में भी कई जटिलताएँ पनपी और यह धर्म पतन की अग्रसर हुआ।
( ख ) संघ में भ्रष्टाचार पनपा – आगे चलकर बौद्ध विहार भ्रष्टाचार का केंद्र बन गया। बौद्ध लोग भोग-विलास में लिप्त हो गये। मठों में धन संग्रह होने लगा। मठों में बौद्ध भिक्षुओं एवं भिक्षुणियों के प्रणय से जनसाधारण का बौद्ध भिक्षुओं से विश्वास उठ गया।
( ग ) हिन्दू धर्म में सुधार – हिन्दू धर्म के जटिलताओं के कारन लोग बौद्ध को अपना रहे थे, जिसके कारण बौद्ध हिन्दू धर्म में भी आंतरिक सुधार किये गये। अतः बौद्ध धर्म से त्रस्त लोग पुनः हिन्दू धर्म में आने लगे। इस प्रकार बौद्ध धर्म का धीरे- धीरे पतन हो गया।
( घ ) विभाजन – गौतम बुद्ध के निर्वाण के पश्चात् इस धर्म में लगातार विभाजन होता गया। महासांघिक, थेरवाद, हीनयान, महायान तथा व्रजयान आदि सम्प्रदायों के स्थापना से बौद्ध धर्म के मूल सिद्धांतों को लगभग भुला ही दिए गये।
( ड़ ) राजकीय संरक्षण का अंत – भारत में पाल वंश के अंत के साथ ही बौद्ध धर्म से राजकीय संरक्षण समाप्त हो गया। बौद्ध के अहिंसावादी सिद्धांत के कारन राजपूत राजाओं ने हिन्दू धर्म को संरक्षण दिया।
( च ) विदेशी आक्रमण – बौद्ध विहारों में किया गया धन का संग्रह भी इस धर्म के पतन का कारन बना। बौद्ध विहारों पर विदेशी आक्रमण हुये। यहाँ के धन को लुटा तथा बौद्ध लोगों की हत्या भी कर दी गयी।
उपरोक्त सभी कारणों से बौद्ध धर्म का पतन हो गया।


Thank you very much for visiting our website to read The Enemy Ncert book solutions. Our aim in creating this website is to promote free education. It is not possible to do this noble work alone, so we need help from those who want to support us in this purpose. You can follow our various pages to support us, whose links are given below:

Leave a Comment