कॉंग्रेस प्रणाली: चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना| Congress Pranali: Chunoutiyan aur Punarsthapna| Class 12 Political Science Chapter 5 NCERT Solution in Hindi. » Jharkhand Pathshala

कॉंग्रेस प्रणाली: चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना| Congress Pranali: Chunoutiyan aur Punarsthapna| Class 12 Political Science Chapter 5 NCERT Solution in Hindi.

Congress Pranali: Chunoutiyan aur Punarsthapna: Political Science Class 12 Chapter 3 NCERT Notes in Hindi. Download pdf notes free.

अति लघु उत्तरीय प्रश्न तथा उत्तर

Q.1.लाल बहादुर शास्त्री पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें.
Ans: श्री लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 1904 में हुआ। उन्होंने 1930 से स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी की और उत्तर प्रदेश मंत्रिमंडल में मंत्री रहे। उन्होंने कांग्रेस पार्टी के महासचिव का पदभार संभाला। वह 1951 से 56 तक केंद्रीय मंत्रिमंडल में मंत्री पद पर रहे। इसी दौरान रेल दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने रेल मंत्री से इस्तीफा दे दिया। 1957 से 64 के बीच में मंत्री पद पर रहे उन्होंने जय जवान, जय किसान मशहूर नारा दिया।

Q.2. S निजलिंगप्पा कौन थे संक्षिप्त परिचय लिखें।
Ans:निजलिंगप्पा का जन्म 1902 में हुआ। वह कांग्रेस के कद्दावर और महान नेता थे। उन्हें देश के नए संविधान निर्माण के लिए गठित संविधान सभा का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। वह लोकसभा के सदस्य रहे। वे मैसूर के मुख्यमंत्री भी रहे थे। उन्हें आधुनिक कर्नाटक के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त हुई। वह 1966 से 1971 तक कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष पर रहे। वर्ष 2000 ईस्वी में उनका निधन हो गया।

Q.3. राम मनोहर लोहिया पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
Ans: राम मनोहर लोहिया का जन्म 1910 में हुआ था। वह समाजवादी नेता तथा विचारक थे तथा स्वतंत्रता सेनानी एवं कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य थे वह मूल पार्टी में विभाजन के बाद सोशलिस्ट पार्टी तथा बाद में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के नेता बने। 1963 से 1967 तक लोकसभा के सांसद रहे वे मैनकाइंड एवं जन के संस्थापक सदस्य रहे गैर यूरोपीय समाजवादी विचारधारा के संयोजन करता और रणनीति कार के रूप में उभरे उन्होंने प्रारंभ में नेहरू जीवन भर दलित और पिछड़े वर्गों को आरक्षण दिए जाने की वकालत की उन्होंने प्रारंभ में नेहरू के खिलाफ मोर्चा खोला। भाषा की दृष्टि से वे अंग्रेजी के घोर विरोधी थे उनका देहांत 1967 में हुआ।

Q.4. लाल बहादुर शास्त्री के प्रधानमंत्री कार्यकाल में मुख्य चुनौतियां कौन कौन सी थी?
Ans: पंडित जवाहरलाल नेहरू के देहांत के बाद लाल बहादुर शास्त्री देश के प्रधानमंत्री बने। उनका प्रधानमंत्री के रूप में कार्यकाल बहुत छोटा रहा परंतु उसे छोटे काल में उनको कई प्रकार की चुनौतियां झेलनी पड़ी जिनमें प्रमुख निम्नलिखित हैं:
सिंडीकेट के प्रभाव, 1962 में हुई चीन का प्रभाव, भारत-पाक युद्ध 1965, अनेक प्राकृतिक विपदाएं।

Q.5. सिंडीकेट से आप क्या समझते हैं?
Ans: सिंडिकेट नेहरू के बाद कांग्रेस में उभरा उन शक्तिशाली नेताओं का गुट था जो विभिन्न राज्यों से संबंधित थे तथा जिनका कांग्रेस संगठन पर नियंत्रण था। इन नेताओं में प्रमुख रूप से मद्रास से कामराज, महाराष्ट्र से एस. के. पाटिल, कर्नाटक से निजलिंगप्पा, पश्चिम बंगाल से अरुण घोष थे।नेहरू के देहांत के बाद लाल बहादुर शास्त्री व श्रीमती इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बनाने में सिंडीकेट के नेताओं की भूमिका थी। सिंडिकेट के नेताओं का यह विश्वास था कि श्रीमती इंदिरा गांधी अनुभवहीन होने के कारण कमजोर प्रधानमंत्री होगी तथा उनके परामर्श पर काम करेंगी।

Q.6.1971 के चुनाव में कांग्रेस की सफलता के कारण बताइए।
Ans:1971 के चुनाव से पहले कांग्रेस की काफी कमजोर स्थिति थी। कांग्रेस गुटबाजी का शिकार थी। कांग्रेस की निर्भरता अन्य दलों पर थी। 1971 के चुनाव में गैर कांग्रेस वालों के नाम पर विपक्षी दलों ने एक बड़ा गठबंधन बना रखा था परंतु कांग्रेस की अप्रत्याशित जीत मिली इसके निम्नलिखित कारण है:
इंदिरा गांधी का करिश्माई व्यक्तित्व, इंदिरा गांधी की किसान गरीब व मजदूर समर्थक नीतियां, गरीबी हटाओ का नारा, नई कांग्रेस की राष्ट्रपति के चुनाव में जीत।

Q.7.गैर कांग्रेसवाद से आप क्या समझते हैं?
Ans:1952 से लेकर 1962 तक के चुनावों में कांग्रेस में कांग्रेस का ही बार-बार सफलता मिलती रही जिससे चुनावी राजनीति पर कांग्रेस का ही प्रभुत्व रहा। गैर कांग्रेसी वोट विभिन्न राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों में बंट जाती थी जिससे कांग्रेस को ही अधिक से अधिक वोट प्राप्त होती थी। 1967 के चुनावों में इस स्थिति को रोकने के लिए विरोधी दलों ने गठबंधन बनाए तथा कांग्रेस के खिलाफ अलग-अलग उम्मीदवार खड़े ना करके एक संयुक्त उम्मीदवार को खड़ा किया। गैर कांग्रेसी विरोधी दलों ने एक प्रकार की भावना का नारा दिया कि इस बार कांग्रेस को हराना है। इस भावना को गैर कांग्रेसवाद के नाम से जाना जाता है। गैर कांग्रेसवाद की भावना का आम चुनाव में प्रभाव दिखाई दिया।

Q.8. 1967 के आम चुनावों में मुख्य मुद्दे क्या थे?
Ans: 1967 का आम चुनाव श्रीमती इंदिरा गांधी के नेतृत्व में हुए इस चुनाव में निम्न प्रमुख मुद्दे थे:
प्राकृतिक आपदाओं का प्रभाव, गंभीर खाद्य संकट, विदेशी मुद्रा भंडार में कमी, औद्योगिक उत्पादन और निर्यात में गिरावट, 1962 में 1965 के युद्ध का प्रभाव, आर्थिक संकट, कीमतों में भारी वृद्धि, कांग्रेस में करिश्माई नेतृत्व का अभाव।

Q.9. कांग्रेस के 1967 के चुनावों में कमजोर प्रदर्शन के मुख्य कारण क्या थे?
Ans: 1967 के चुनाव मैं कांग्रेस के प्रभुत्व को झटका लगा कई राज्यों में यह सरकार नहीं बना सकी तथा केंद्र में भी केवल साधारण बहुमत प्राप्त हुआ वह कई दलों के समर्थन से बनी। इस प्रकार प्रभाव में कमी आने के निम्न कारण था:
चीन व पाकिस्तान के युद्ध का प्रभाव, मानसून फेल हो जाने के कारण खाद्यान्न में कमी, आवश्यक चीजों की कीमतों में बढ़ोतरी , करिश्माई नेतृत्व का अभाव, कांग्रेस की गुटबाजी श्रीमती इंदिरा गांधी की अनुभवहीनता, कई सारे क्षेत्रीय दलों के विकास का कारण।

Q.10. राष्ट्रपति के 1969 के चुनावों में कांग्रेस का आधिकारिक उम्मीदवार क्यों सफल नहीं हो सका?
Ans:1969 के राष्ट्रपति के चुनाव के समय श्रीमती इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थी जबकि कांग्रेस संगठन पर सिंडीकेट गुट का नियंत्रण था इस गुट ने एन. संजीव रेड्डी को कांग्रेस का अधिकारिक उम्मीदवार राष्ट्रपति पद के लिए घोषित कर दिया। श्रीमती इंदिरा गांधी ने तत्कालीन उपराष्ट्रपति डॉ वी. वी. गिरी को स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में खड़ा कर दिया तथा प्रचार किया जिससे कांग्रेस का असली उम्मीदवार चुनाव हार गया वह वीवी गिरी चुनाव जीत गए।

Q.11. श्री वी वी गिरी का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
Ans: श्री वी वी गिरि का जन्म 1893 में हुआ कांग्रेस के नेता होने के साथ-साथ आंध्र प्रदेश में एक मजदूर नेता के रूप में ख्याति प्राप्त की जो केंद्रीय मंत्रिमंडल में श्रम मंत्री रहने के साथ-साथ उत्तर प्रदेश, केरल, मैसूर तीनों राज्यों में राज्यपालों के पदों पर रहने के साथ-साथ 1974 तक भारत के उपराष्ट्रपति जाकिर हुसैन के निधन के बाद कार्यकारी राष्ट्रपति पद पर रहे। उन्होंने 1969 में स्वतंत्र प्रत्याशी के रूप में कांग्रेस पार्टी के संजीव रेड्डी को पराजित कर एक नया इतिहास रचा। सन 1980 में उनका निधन हो गया।

Q.12. 1969 में कांग्रेस के विभाजन के प्रमुख कारण बताइए।
Ans: 1967 के चुनाव से पहले ही कांग्रेस में गुटबाजी प्रारंभ हो गई थी कांग्रेस पर कुछ बड़े नेताओं का एक गुट हावी था जिसको सिंडीकेट के नाम से जाना जाता था। 1967 के चुनाव में कांग्रेस के प्रभुत्व में कमी आ गई तथा 1969 में कांग्रेस का औपचारिक विभाजन हो गया जिसके निम्न प्रमुख कारण थे:

  • सिंडिकेट जो कि कांग्रेस के कुछ बड़े नेताओं का गुट था, का अत्यधिक प्रभाव
  • कांग्रेस के बीच गुटबाजी। सिंडीकेट के ग्रुप और श्रीमती इंदिरा गांधी में गुटबाजी प्रारंभ हो गई थी
  • श्रीमती इंदिरा गांधी का प्रभावशाली व्यक्तित्व
  • श्रीमती इंदिरा गांधी की समाजवादी तथा साम्यवादी नीतियां जो कांग्रेस की पूंजीवादी लोबी के लोगों को पसंद नहीं थी
  • राष्ट्रपति के चुनाव में टकराव।

Q.13.प्रीवि पर्स से आप क्या समझते हैं?
Ans:श्रीमती इंदिरा गांधी के अनेक साहसिक कदमों में से प्रीविपर्स को समाप्त करना एक साहसिक कदम था जिसका उद्देश्य समाजवादी विचारधारा पर समाज का निर्माण करना था प्रीवि पर्स वह व्यवस्था बहुत खूब राजा महाराजाओ को कुछ निजी संपदा रखने का अधिकार दिया गया साथ-साथ सरकार की ओर से उन्हें कुछ विशेष भत्ते दिए जाएंगे इस प्रकार से प्रिवी पर्स उन राजा महाराजाओं को दी गई विशेष आर्थिक सुविधा थी जिन्होंने सुरक्षा से अपने राज्यों को भारतीय संघ में विलय करना स्वीकार कर लिया था पंडित जवाहरलाल नेहरु जी पृवी पर्स के खिलाफ थे परंतु कई नेताओं की ओर से समाप्त करने का विरोध होता रहा था इंदिरा गांधी ने अपने कार्यकाल में 1971 में समाप्त कर दिया

Q.14. के कामराज कौन थे? संक्षिप्त विवरण दें।
Ans:के कामराज का जन्म 1903 में हुआ था। वे देश के महान स्वतंत्रता सेनानी थे उन्होंने कांग्रेस के एक नेता के रूप में अत्यधिक ख्याति प्राप्त की। उन्हे मद्रास (तमिलनाडु) के मुख्यमंत्री के पद पर रहने का सौभाग्य मिला। मद्रास प्रांत के शिक्षा का प्रसार और स्कूली बच्चों को दोपहर का भोजन देने का योजना लागू करने के लिए उन्हे अत्यधिक ख्याति प्राप्त हुई। उन्होंने 1963 में कामराज योजना नाम से मशहूर को एक प्रस्ताव रखा जिसके अंतर्गत उन्होंने सभी वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं को त्यागपत्र दे देने का सुझाव दिया ताकि वह अपेक्षाकृत कांग्रेस पार्टी के युवा कार्यकर्ताओ को पार्टी के कमांड संभाल सके। वह पार्टी के अध्यक्ष भी रहे। 1975 में उनका देहांत हो गया।

Q.15. प्रारंभ में कांग्रेस का चुनाव चिन्ह क्या था?
Ans:प्रारंभ में कांग्रेस का चुनाव चिन्ह दो बैलों की जोड़ी थी। आजादी के 22 वर्ष गुजरते गुजरते कांग्रेस में फुट पड़ गई थी। आजकल हाथ इस दल का चुनाव चिन्ह है।

लघु उत्तरीय प्रश्न तथा उत्तर

Q.1. कांग्रेस की पुनर्स्थापना से आप क्या समझते हैं?
Ans: कांग्रेस का इतिहास स्पष्ट रूप से बताता है कि 1952 के प्रथम चुनाव से लेकर 1962 तक कांग्रेस का प्रभुत्व सारे देश पर रहा। केंद्र में तथा लगभग सभी राज्यों में कांग्रेस की सरकार रही। जवाहरलाल नेहरू के करिश्माई नेतृत्व ने इस प्रभुत्व को बनाए रखा परंतु नेहरू के बाद 1967 में जब चौथा चुनाव हुआ तो कांग्रेस के प्रभुत्व में गिरावट आ गई तथा देश के 9 राज्यों में कांग्रेस सरकार नहीं बना पाई। वोट प्रतिशत घटा। कांग्रेस की स्थिति में लगातार गिरावट आया 1966 में श्रीमती इंदिरा गांधी तथा सिंडिकेट के नेतृत्व में सत्ता संघर्ष प्रारंभ हो गया जो 1969 में हुए राष्ट्रपति के चुनाव में खुलकर सामने आ गया तथा कांग्रेस 1969 में ही औपचारिक रूप से विभाजित हो गई इस प्रकार से कांग्रेस में 1967 से लेकर 1969 तक गिरावट का दौर रहा परंतु 1971 में हुए मध्चुयावधि चुनाव में इंदिरा गांधी कांग्रेस ने और कांग्रेस को नया जीवन दिया। सभी विरोधी दलों के द्वारा कांग्रेस के खिलाफ विशाल गठबंधन बनाकर चुनाव लड़ने के बावजूद कांग्रेस ने 48 प्रतिशत वोट प्राप्त करके लोकसभा की 375 सीटें प्राप्त की। इससे यह भी सिद्ध हो गया कि इंदिरा कांग्रेस ही वास्तविक कांग्रेस है। इसे ही कांग्रेस की पुनर्स्थापना कहते हैं।

Q.2. चौथे आम चुनाव, 1967 में कांग्रेस के प्रभाव में गिरावट के कारण तथा प्रभाव लिखें।
Ans:1967 के चौथे आम चुनाव कांग्रेस के लिए अच्छे वातावरण में नहीं हुआ। देश आर्थिक संकट से गुजर रहा था, आवश्यक चीजों की कीमतें आसमान छू रही थी। इस स्थिति को विरोधी दलों ने सरकार के खिलाफ बनाया विरोधी दल इकट्ठे हो गए तथा सारे देश में गैर कांग्रेस वाद का संदेश फैला रहे थे। सभी विरोधी दलों ने संगठित होकर कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ा। चुनाव के दौरान कांग्रेस एक दल के रूप में कमजोर थी क्योंकि कांग्रेस इस दौरान गुटबाजी के दौर से गुजर रहे थे। कांग्रेस पर कब्जे के लिए इंदिरा गांधी के समर्थकों में सत्ता संघर्ष चल रहा था। 1967 के चुनाव के परिणाम इस बार के चुनाव में कांग्रेस का 1967 के चुनाव में पहली बार कांग्रेस के प्रभुत्व में गिरावट आई। इसका प्रभाव बिल्कुल स्पष्ट था। कांग्रेस को 9 राज्य- हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल तथा केरल में सरकारें गवानी पड़ी। 1967 के चुनाव में कांग्रेस केंद्र में केवल साधारण बहुमत से ही सरकार बना पाई।

Q.3.1969 में कांग्रेस के विभाजन के कारण बताएं।
Ans:जैसा कि हम जानते हैं कि राष्ट्रपति के चुनाव में 1969 में ही कांग्रेस के बीच आपसी संघर्ष अत्यधिक गहरा हो गया था। सिंडीकेट के नेताओं ने प्रारंभ में यह सोचा था कि श्रीमती इंदिरा गांधीअनुभवहीन है, अतः उनके निर्देश तथा परामर्श पर कार्य करेंगे परंतु ऐसा नहीं हुआ। श्रीमती इंदिरा गांधी ने अपने सत्ता का अपने तरीके से प्रयोग किया। समाज के वर्गों को अपनी और गांधी ने आकर्षित करने के लिए कल्याणकारी कार्यक्रम प्रारंभ किए। इंदिरा गांधी ने अपनी नीतियों में समाजवादी तथा साम्यवादी विचारधारा को बढ़ावा दिया जिससे कांग्रेस का पूंजीपति वर्ग भी इंदिरा जी से नाराज हुआ। कांग्रेस के बीच का यह संघर्ष अंततः कांग्रेस के विभाजन के रूप में बदल गया।

Q.4.1971 के मध्यावधि चुनाव का महत्व समझाएं।
Ans:1971 के मध्यावधि चुनाव में मुख्य मुकाबला कांग्रेस साम्यवादी गठबंधन व गैर कांग्रेसी दलों के विशाल गठबंधन के बीच था। विशाल गठबंधन में कई विरोधी दल शामिल थे इनमें मुख्य रूप से एसएसपी, भारतीय जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी व भारतीय क्रांति दल। पुरानी कांग्रेस का अधिक प्रभाव नहीं था। इस चुनाव में मुख्य मुद्दा आर्थिक संकट तथा महंगाई का था। इस मुद्दे पर ही गैर कांग्रेसी दल सरकार को हटाना चाहते थे उनका प्रमुख नारा ‘इंदिरा हटाओ’ व श्रीमती इंदिरा गांधी का नारा ‘गरीबी हटाओ ‘था। 1971 के चुनावों में परिणामों ने सभी को चकित कर दिया। इंदिरा कांग्रेस को सबसे अधिक कमजोर स्थिति में समझा जा रहा था क्योंकि सभी विरोधी दलों ने एक मजबूत विशाल संगठन बना लिया था परंतु इस चुनाव में सबसे अधिक सफलता इंदिरा गांधी कॉंग्रेस को ही मिली। लोकसभा की 375 सीटें प्राप्त कर तथा 48% वोट प्राप्त किए। इससे यह भी साबित हो गया कि इंदिरा कांग्रेस में वास्तविक कांग्रेस है।

Q.5.1969 में हुए राष्ट्रपति के चुनाव के प्रतिनिधियों को लिखें।
Ans:जाकिर हुसैन की मृत्यु के बाद राष्ट्रपति का चुनाव कराना आवश्यक हो गया। कांग्रेस पहले से ही गुटबाजी का शिकार बनी हुई थी। कांग्रेस में सिंडीकेट गुट तथा इंदिरा गुट में संघर्ष चल रहा था। राष्ट्रपति के पद के लिए कांग्रेस की ओर से एंड संजीव रेड्डी को आधिकारिक उम्मीदवार बनाया गया परंतु श्रीमती इंदिरा गांधी ने अपनी ओर से तत्कालीन उपराष्ट्रपति श्री वीवी गिरी को राष्ट्रपति पद के लिए स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में ना केवल खड़ा किया बल्कि कांग्रेस के अधिकारिक उम्मीदवार संजीव रेड्डी के खिलाफ वीवी गिरी की जीत को विकसित किया। इस घटना से कांग्रेस का अंदरूनी संघर्ष और तेज हो गया सिंडीकेट ने असली कांग्रेस का दावा करते हुए श्रीमती इंदिरा गांधी को कांग्रेस से पार्टी विरोधी गतिविधियों के इल्जाम से निष्कासित कर दिया परंतु कांग्रेस पर इंदिरा गांधी ने पहले ही अपना प्रभाव जमाया हुआ था इस संघर्ष के परिणामस्वरूप 1969 में कांग्रेस में औपचारिक रूप से विभाजन हो गया इंदिरा गांधी की कांग्रेस के बाद में वास्तविक कांग्रेस उभरकर आई जिसको 1971 में चुनाव में भारी सफलता मिली।

Q.6.सिंडिकेट से आप क्या समझते हैं? कांग्रेस का सिंडिकेट तथा इंदिरा गांधी के संघर्ष को समझाएं।
Ans:पंडित जवाहरलाल नेहरू के देहांत के बाद कांग्रेस में गुटबाजी प्रारंभ हो गई कांग्रेस में राज्यों के वरिष्ठ नेताओं का एक प्रभाव कारी शक्तिशाली गुट के रूप में उभर कर निकला जिस्ने कांग्रेस के निर्णय को प्रभावित करना प्रारंभ कर दिया। मद्रास के पूर्व मुख्यमंत्री इस गुट से प्रमुख नेता थे। अन्य प्रमुख नेता श्रीमती इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री के रूप में नियुक्त करने में इस गुट की अहम भूमिका थी। कांग्रेस में इस गुट को सिंडिकेट के नाम से जाना जाता है। बाद में आकर जैसे-जैसे श्रीमती इंदिरा गांधी ने अपने निर्णय स्वयं लेने प्रारंभ किए तो सिंडिकेट के साथ उनका संघर्ष प्रारंभ हो गया। श्रीमती इंदिरा गांधी ने कुछ जनकल्याणकारी निर्णय स्वयं लिए जिससे संघर्ष और बढ़ गया। 1969 में राष्ट्रपति के चुनाव में दोनों आमने-सामने आ गए तथा 1969 में ही कांग्रेस का विभाजन हो गया।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न तथा उत्तर

Q.1.गैर कांग्रेस वाद पर विस्तारीत टिप्पणी लिखें।
Ans:आजादी के बाद से ही कुछ समाजवादी नेताओं ने देश में कांग्रेस विरोधी या गैर कांग्रेस वाद का राजनैतिक माहौल बनाने का प्रयास किया वास्तव में भारत विभिन्न नेताओं वाला एक विशाल देश था जो आज भी है देश में सारा राजनीतिक माहौल और अन्य क्षेत्रों से जुड़ी हुई स्थिति देश की दलगत राजनीति से अलग-थलग नहीं रह सकती थी विपक्षी दल जन विरोध की अगुवाई कर रहे थे और सरकार पर दबाव डाल रहे थे कांग्रेस की विरोधी पार्टियों ने महसूस किया कि उसके वोट बंट जाने के कारण ही कांग्रेस सत्तासीन है राजनीतिक दल जो अपने कार्यक्रम अथवा विचारधाराओं के धरातल पर एक दूसरे से अलग थे सभी दल एकजुट हुए और उन्होंने कुछ राज्यों में एक कांग्रेस एक विरोधी मोर्चा बनाया तथा अन्य राज्यों में सीटों के मामले में चुनावी तालमेल किया इन दलों को लगा कि इंदिरा गांधी की अनुभव ही नेता अनुभव ही नेता और कांग्रेस की अंदरूनी उठापटक से उन्हें कांग्रेस को सत्ता से हटाने का एक अवसर हाथ लगा है। समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया ने इस रणनीति को गैर कांग्रेसवाद का नाम दिया उन्होंने गैर कांग्रेस वाद के पक्ष में सैद्धांतिक तर्क देते हुए कहा कि कांग्रेस का शासन और लोकतांत्रिक और गरीब लोगों के हितों के खिलाफ है इसलिए गैर कांग्रेसी दलों का एक साथ आना जरूरी है ताकि गरीबों के हित में लोकतंत्र को वापस लिया जा सके।

Q.2. आया राम गया राम पर टिप्पणी लिखें।
Ans:विधायकों द्वारा तुरंत तुरंत पार्टी छोड़कर दूसरी तीसरी पार्टी में शामिल होने की घटना से भारत के राजनीतिक शब्दकोश में आया राम गया राम का मुहावरा शामिल हुआ इस मुहावरे की प्रसिद्धि के साथ एक घटना जोड़ी है 1967 के चुनाव के बाद हरियाणा के एक विधायक गया लाल ने राजनीतिक निष्ठा बदलने का जैसे एक कीर्तिमान भी स्थापित कर दिया था उन्होंने एक पखवाड़े के अंदर तीन बार अपनी पार्टी बदली पहले वे कांग्रेस से यूनाइटेड फ्रंट में गए फिर यूनाइटेड फ्रंट से कांग्रेस में चले आए कहा जाता है कि जब गया लाल यूनाइटेड फ्रंट छोड़कर कांग्रेस में आने की इच्छा प्रकट की तो नेता राम विरेंद्र सिंह उन्हें लेकर चंडीगढ़ प्रेस के सामने घोषणा की गयाराम था अब आया राम है गया लाल की हड़बड़ी को आया राम गया राम के मुहावरे में हमेशा के लिए दर्ज कर लिया गया उनकी इस हड़बड़ी को लेकर बहुत से चुटकुले और कार्टून बने बाद में समय में दलबदल रोकने के लिए संविधान में संशोधन किया गया लेकिन कई बार अब भी दल बदल या आया राम गया राम के उदाहरण देखने को मिलते हैं लोकतंत्र के साथ-साथ दलबदल या आया राम गया राम एक निंदनीय और भद्दा मजाक है।

Q.3.चौथे आम चुनाव 1967 पर एक लेख लिखें.
Ans:प्रस्तावना– भारत के राजनीतिक और चुनावी इतिहास को 1967 के वर्ष को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है और इससे 52 के प्रथम आम चुनाव से लेकर 1966 के तक कांग्रेस पार्टी का सारे देश के अधिकांश राज्यों और केंद्र में राजनीतिक दबदबा कायम रहा लेकर 1967 के आम चुनाव में इस प्रवृत्ति में गहरा परिवर्तन आया.

1967 के आम चुनाव तथा उससे पूर्व देश के समक्ष आर्थिक समस्याएं तथा चुनौतियां– चौथे आम चुनाव के आने तक देश में बड़े बदलाव हो चुके थे दो प्रधानमंत्रियों का जल्दी-जल्दी देहावसान हुआ और नए प्रधानमंत्री को पद संभाले हुए अभी पूरा 1 साल का वर्षा भी नहीं गुजरा था साथ ही इस प्रधानमंत्री को राजनीति के लिहाज से कम अनुभवी माना जा रहा था।

कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा व्हिप जारी करना- गुजरे वक्त में भी कांग्रेस के भीतर इस तरह के मतभेद उठ चुके थे लेकिन इस बार मामला कुछ अलग ही था दोनों गुट चाहते थे कि राष्ट्रपति पद के चुनाव में ताकत को आजमा ही लिया जाए तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष एस निजलिंगप्पा ने भी जारी किया कि सभी कांग्रेसी सांसद और विधायक पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार संजीव रेड्डी को वोट डालें।

अंतरात्मा की आवाज के अनुसार मत डालने पर जोर देना– इंदिरा गांधी के समर्थक गुट ने अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के विशेष बैठक आयोजित करने की याचना की लेकिन उनकी यह याचना स्वीकार नहीं की गई वी वी गिरि का छुपे तौर पर समर्थन करते हुए प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने खुलेआम अंतरात्मा की आवाज पर वोट डालने को कहा इसका मतलब यह था कि कांग्रेस के सांसद और विधायक अपनी मनमर्जी से किसी भी उम्मीदवार को वोट डाल सकते थे वे स्वतंत्र उम्मीदवार थे जबकि संजीव रेड्डी कांग्रेस पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार थे।

कांग्रेस के आधिकारिक प्रत्याशी की पराजय– कांग्रेस पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार की हार से पार्टी का टूटना तय हो गया कांग्रेस अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री को अपनी पार्टी से निष्कासित कर दिया पार्टी से निष्कासित प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा कि उनकी पार्टी की असली कांग्रेस है और 1969 के नवंबर तक सिंडिकेट की अगुवाई वाले कांग्रेसी खेमे को कांग्रेस ऑर्गनाइजेशन और इंदिरा गांधी की अगुवाई वाले कांग्रेस खेमे की कांग्रेस रिक्वेस्ट कहा जाने लगा था इन दोनों दलों को क्रमशः पुरानी कांग्रेस और नई कांग्रेस भी कहा जाता था इंदिरा गांधी ने पार्टी की इस अटूट को विचारधाराओं के लड़ाई के रूप में पेश किया उन्होंने इसे समाजवादी और पुरातन पंथी तथा गरीबों के हिमायती और अमीरों की तरफदारी के बीच की लड़ाई करार दिया।

Q.4.जवाहरलाल नेहरू के उपरांत लाल बहादुर शास्त्री की सत्ता में आने से लेकर उनकी मृत्यु उपरांत तक कुछ राजनीतिक घटनाओं और उपलब्धियों का संक्षेप में विवरण दीजिए।
Ans:शास्त्री जी का उत्तराधिकारी के रूप में चयन– जवाहरलाल नेहरू के उत्तराधिकारी का सवाल इतनी आसानी से हल कर लिया गया कि आलोचक ठगे से रह गए नेहरू की मृत्यु के बाद कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष के कामराज ने अपने पार्टी के नेताओं और सांसदों से सलाह मशवरा किया उन्होंने पाया कि सभी लाल बहादुर शास्त्री के पक्ष में हैं शास्त्री कांग्रेस संसदीय दल के निर्विरोध नेता चुने गए और इस तरह वे देश के प्रधानमंत्री बने।

शास्त्री जी के व्यक्तित्व के प्रभावशाली गुण-लाल बहादुर शास्त्री बिहार के थे और नेहरु के मंत्रिमंडल में कई सालों तक मंत्री रहे थे उनको लेकर कभी किसी किस्म का विवाद नहीं उठा था अपने आखिरी सालों में नेहरू उन पर ज्यादा से ज्यादा निर्भर होते गए थे शास्त्री अपनी सादगी और सिद्धांत निष्ठा के लिए प्रसिद्ध थे एक दफा एक बड़ी रेल दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दे चुके थे।

प्रधानमंत्री के रूप में शास्त्री जी– लाल बहादुर शास्त्री 1964 से 1966 तक देश के प्रधानमंत्री रहे इस पद पर भी खड़े कम दिनों तक रहे लेकिन इसी छोटी अवधि में देश ने दो बड़ी चुनौतियों का सामना किया भारत चीन युद्ध के कारण पैदा हुए आर्थिक कठिनाइयों से उबरने की कोशिश कर रहा था साथ ही मानसून की असफलता से देश में सूखे की स्थिति थी कई जगहों पर खदान का गंभीर संकट आ पड़ा था फिर 1965 में पाकिस्तान के साथ भी युद्ध करना पड़ा शास्त्री ने जय जवान जय किसान का नारा दिया जिससे इन दोनों चुनौतियों से निपटने के उनके दृढ़ संकल्प का पता चलता है।

ताशकंद समझौता और निधन- प्रधानमंत्री के पद पर शास्त्री बड़े कम दिनों तक रहे जनवरी 1966 को ताशकंद में अचानक उनका देहांत हो गया ताशकंद तब भूतपूर्व सोवियत संघ में था और आज यह उज्बेकिस्तान में है पाकिस्तान युद्ध समाप्त करने हेतु तत्कालीन राष्ट्रपति मोहम्मद अयूब खान से बातचीत करने और एक समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए वे ताशकंद गए थे।

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