बाजार एक सामाजिक संस्था के रूप में| bajar ek samajik Sanstha ke roop mein| sociology class 12| Chapter 4 NCERT Solution in hindi » Jharkhand Pathshala

बाजार एक सामाजिक संस्था के रूप में| bajar ek samajik Sanstha ke roop mein| sociology class 12| Chapter 4 NCERT Solution in hindi

भारतीय समाज की जनसांख्यिकीय संरचना समाजशास्त्र कक्षा 12: Sociology class 12 notes and important question answer for the final examinations.

Bajar ek samajik Sanstha ke roop mein: अति लघु उत्तरीय प्रश्न तथा उत्तर

Q.1.बाजार से क्या तात्पर्य है?
Ans: बाजार एक क्षेत्र या व्यापार या कारोबार की श्रेणी से संबंध रखता है। जैसे – कारो या कपड़ों का बाजार। यह विभिन्न प्रकार की आर्थिक क्रियाओं और संस्थाओं को इंगित करता है। बाजार एक आर्थिक तथा सामाजिक संस्था भी है।

Q.2. एडम स्मिथ के बाजारी अर्थव्यवस्था के तर्क के बारे में बताइये।
Ans: राजनीतिक अर्थशास्त्रियों में एडम स्मिथ सर्वाधिक प्रचलित थे जिन्होंने बजारी अर्थव्यवस्था को अपनी किताब ‘द वेल्थ ऑफ नेशन’ में समझाया। उनका तर्क था कि बजारी अर्थव्यवस्था व्यक्तियों में आदान-प्रदान य सौदों का एक लंबा क्रम है जो अपनी क्रमबद्धता की वजह से स्वयं एक कार्यशील और स्थिर व्यवस्था की स्थापना करती है।

Q.3. सप्ताहिक बाजारों की पहाड़ी व जंगलीय इलाकों में क्या प्रासंगीकरण है?
Ans: पहाड़ी इलाकों में स्थानीय लोग इन साप्ताहिक बाजारों में अपनी खेती की उपज या जंगल से प्राप्त पदार्थों को बेचते हैं। इन बाजारों से प्राप्त पैसों से वे अपने लिए आवश्यक वस्तुएं, जैसे- नमक व खेती के औजार और अपने उपभोग की वस्तुएं खरीदते हैं।

Q.4. एल्फ्रेड गेल के अनुसार बाजार का क्या महत्व है?
Ans: एल्फ्रेड गेल जैसे मानवविज्ञानी के अनुसार बाजार का महत्व आर्थिक क्रियाओं तक सीमित ना होकर सामाजिक संस्था के रूप में भी है। विभिन्न सामाजिक समूह, जाति एवं सामाजिक अधिक्रम में एवं बाजार व्यवस्था में अपनी स्थिति के अनुसार स्थापित होते हैं। बाजार की रूपरेखा उस क्षेत्र के अधिक्रमित अंतर – समूहो के सामाजिक संबंधों का प्रतीकात्मक चित्रण करती हैं।

Q.5. जनजातीय अर्थव्यवस्था में बदलाव के कारण बताइए।
Ans: जनजातीय अर्थव्यवस्था में बदलाव के अनेक कारण हैं जो इस प्रकार है –
(i) जनजातीय क्षेत्रों में साप्ताहिक बाजारों के स्वरूप में काफी परिवर्तन हुआ है।
(ii) दूरस्थ क्षेत्रों को धीरे-धीरे क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओ से जोड़ दिया गया।
(iii) जनजातीय क्षेत्रों को सड़कों के निर्माण द्वारा स्थानीय लोगों के लिए खोला गया जिससे इन इलाकों के समृद्ध जंगलों तक पहुंचा जा सके।

Q.6. उपनिवेशवाद के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था में क्या बदलाव आए?
Ans: उपनिवेशवाद के कारण भारतीय व्यापार में गहरे परिवर्तन आए। इसके कारण भारत विश्व की पूंजीवादी अर्थव्यवस्था से और अधिकता से जुड़ गया। उपनिवेशवाद के बाद भारत से कच्चे माल, कृषि उत्पाद व अन्य उत्पादित सामानों का निर्यात किया जाने लगा। भारत में बाजार अर्थव्यवस्था के विस्तार में कुछ व्यापारिक समुदायों को नए अवसर प्रदान किए गए मारवाड़ी समुदाय इस उपनिवेशवाद द्वारा विकसित सबसे अधिक प्रचलित जाना गया व्यापारिक समुदाय हैं।

Q.7. उपनिवेशवाद को परिभाषित करें।
Ans: उपनिवेशवाद एक ऐसी विचारधारा, जिसके द्वारा एक देश दूसरे देश को जीतने और उसे अपना उपनिवेश बनाने का प्रयत्न करता है अर्थात वहां जबरन बसने या शासन करने का प्रयत्न करता है।

Q.8. मारवाड़ी समुदाय क्या है?
Ans: मारवाडीयों का प्रतिनिधित्व बिडला परिवार जैसे नामी ओद्योगिक घरानों से है। ये छोटे – छोटे दुकानदार और व्यापारी भी है। ये भारत में पाए जाने वाले सबसे अधिक प्रचलित व्यापारिक समुदाय हैं। ओपनिवेशक काल के दौरान ये एक सफल व्यापारिक समुदाय बने, जब उन्होंने कलकता से मिले सुअवसरो का लाभ उठाया और देश के सभी भागों में अपनी साहूकारिता जारी रखने के लिए बस गए।

Q.9. कार्ल मार्क्स की पूंजीवाद के लिए विचारधारा का उल्लेख कीजिए।
Ans: मार्क्स ने पूंजीवाद को पण्य उत्पादन या बाजार के लिए उत्पादन करने की व्यवस्था के रूप में समझा, जो कि श्रमिक की मजदूरी पर आधारित है। मार्क्स के अनुसार सभी आर्थिक व्यवस्थाएं सामाजिक व्यवस्थाएं भी है। हर उत्पादन विधि उत्पादन संबंधों से बनती है और एक विशिष्ट वर्ग संरचना से बनती है।

Q.10. पण्यीकरण से क्या तात्पर्य है?
Ans: पण्यकरण की स्थिति तब होती है जब बाजार में कोई वस्तु बेची या खरीदी न जा सकती हो, परंतु अब वह बेची या खरीदी जा सकती हो। इसका अर्थ हुआ कि अब वह वस्तु बाजार में बिकने वाली एक चीज बन गई है, जैसे- श्रम और कौशल।

Q.11. समकालीन भारत की दो प्रक्रियाओं के बारे में बताइए।
Ans: समकालीन भारत में कुछ चीजें या प्रक्रियाएं ऐसी है जो पहले बाजार का हिस्सा नहीं थी, परंतु अब वह बाजार में मिलने वाली वस्तुएं हो गई है। जैसे-
(i)विवाह जो पहले परिवारों द्वारा तय किए जाते थे, अब मैरिज ब्यूरो के द्वारा या वेबसाइट के जरिए होते हैं।
(ii) अनेक निजी संस्थाएं विद्यार्थियों को समकालीन विश्व में सफल होने के लिए आवश्यक संस्कृतिक और सामाजिक कौशल सिखाते हैं।

Q.12. एकीकरण का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
Ans: एकीकरण का अर्थ है कि दुनिया के किसी एक कोने में किसी बाजार में परिवर्तन होता है तो दूसरे कोने में उसका अनुकूल – प्रतिकूल असर हो सकता है, जेसे – अमेरिकी बाजार में गिरावट आने से भारतीय सॉफ्टवेयर उद्योग में भी गिरावट आएगी।

Q.13. आधुनिक समाजों में उपभोग की क्या प्रासंगिकता है?
Ans: आधुनिक समाजो में उपभोग एक महत्वपूर्ण तरीका है जिसके द्वारा सामाजिक विभिन्नता का निर्माण होता है। उपभोक्ता अपनी सामाजिक, आर्थिक स्थिति या संस्कृतिक प्राथमिकताओं को कुछ विशेष वस्तुओं को खरीदकर या उनका प्रदर्शन कर प्रदर्शित करता है और कंपनियां समान प्रस्थिति या संस्कृति के प्रतीकों के आधार पर बनाती व बेचती है।

Q.14. भूमंडलीकरण की व्याख्या करें।
Ans: आर्थिक सामाजिक, प्रौद्योगिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक परिवर्तनों की एक जटिल श्रृंखला जिसमें विविध प्रकार के स्थानों के लोगों और आर्थिक कार्यकर्ताओं में पारस्परिक निर्भरता एकीकरण और अत: क्रिया को बढ़ावा दिया गया है।

Q.15. बाजारीकरण के बारे में लोगों के क्या विचार हैं?
Ans: बाजारीकरण का समर्थन करने वाले लोगों का मानना है कि इससे समाज में आर्थिक समृद्धि व संवृद्धि को बढ़ावा मिलेगा, क्योंकि ये निजी संस्थाएं सरकारी संस्थाओं की अपेक्षा ज्यादा कुशल होती है।

Bajar ek samajik Sanstha ke roop mein: लघु उत्तरीय प्रश्न तथा उत्तर

Q.1. बाजार सामाजिक संस्थाएं क्या है?
Ans: समाजशास्त्रियों ने बड़े सामाजिक ढांचे के अंदर आर्थिक संस्थाओं और प्रक्रियाओं को समझने के लिए एक वैकल्पिक तरीकों का विकास करने का प्रयास किया है। समाजशास्त्री मानते है कि बाजार सामाजिक संस्थाएं हैं जो किसी विशेष प्रकार के तरीकों द्वारा निर्मित होती है। उदाहरणतया, बाजारो का नियंत्रण व संगठन अक्सर विशेष सामाजिक समूहों या वर्गों के द्वारा होता है। बाजारों के निर्माण व देख – रेख में विशेष सामाजिक समूह वह वर्ग दखल – अंदाजी करते हैं और इसे सुचारु रुप से चलाते हैं। बाजारों की अन्य संस्थाओं, सामाजिक प्रक्रियाओ और संरचनाओं से भी विशेष संबद्धता होती है। समाजशास्त्री अक्सर इसी विचार को प्रकट करते हैं कि अर्थव्यवस्थाएं समाज में रची – बसी है। उदाहरणतया, ‘साप्ताहिक आदिवासी हाट ‘ और ‘पारंपरिक व्यापारिक समुदाय’ और भारत के औपनिवेशिक दौर में उसका लेन-देन का नेटवर्क या तंत्र। कृषक या खेतिहर समाजों में आवधिक बाजार या हाट, सामाजिक और आर्थिक संगठन व्यवस्था कि एक केंद्रीय विशेषता होती है।

Q.2. भारत में वैश्य के अर्थ को समझाइए।
Ans: वैश्य चार वर्गों में से एक है। यह तथ्य भारतीय समाज में प्राचीनकाल से व्यापार और व्यापार करने वाले व्यापारी के महत्व को दर्शाता है। ‘वैश्य’ स्थिति अक्सर स्थिर पहचान या सामाजिक स्थिति की तुलना में अधिकार या आकांक्षा से प्राप्त की हुई होती है। कुछ ऐसे वैश्य समुदाय भी है जिनका पारंपरिक व्यवसाय एक लंबे समय से व्यापार रहा है। कुछ अन्य जाति समूह भी है जो व्यापार में शामिल हो गए हैं। ऐसे समूह व्यापार के क्षेत्र में ऊपर उठने के लिए ‘वैश्य’ की प्रतिस्थिति की आकांक्षा रखते हैं या इस पर अधिकार जताते हैं। भारत में पारंपरिक व्यापारिक समुदायों में सिर्फ ‘वैश्य’ ही नहीं बल्कि और भी समूह अपनी भिन्न धार्मिक या अन्य सामुदायिक पहचानों के साथ शामिल हैं। इन समूहों व समुदायों में जैन, पारसी, सिंधी इत्यादि शामिल हैं।

Q.3. उदारवादिता की विभिन्न नीतियो के नाम बताइए।
Ans: उदारवादिता में कई तरह की नीतियां शामिल है, जैसे –
(i) सरकारी विभागों का निजीकरण,
(ii) पूंजी,
(iii) श्रम और व्यापार में सरकारी दखल कम देना,
(iv)विदेशी वस्तुओं के आघात के लिए आयात शुल्क में कमी करना,
(v) विदेशी कंपनियों को भारत में उद्योग स्थापित करने में सहूलियत देना।

Q.4. संस्कृति बाजार का हिस्सा कैसे बन जाती है? उदाहरण सहित बताइए।
Ans: अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन के बढ़ते बाजार से, संस्कृति बाजार का एक हिस्सा बन जाती है। इसका उदाहरण है – राजस्थान में लगने वाला प्रसिद्ध वार्षिक मेला, जिसे ‘पुष्कर’ के नाम से जाना जाता है। इस मेले में दूर – दराज से व्यापारी और पशुचारी ऊंटो व अन्य पशुओं को बेचने एवं खरीदने आते हैं। यह मेला अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी एक बड़े पर्यटन स्थल के नाम से जाना जाता है। यह स्थानीय लोगों के लिए एक भव्य सामाजिक और आर्थिक उपलक्ष्य है। यह कार्तिक पूर्णिमा के ठीक पहले आता है जिससे यह मेला पर्यटकों के लिए और भी अधिक आकर्षण का कारण बन जाता है। कार्तिक पूर्णिमा वाले दिन हिंदू लोग व तीर्थयात्री पवित्र पुष्कर तालाब में स्नान करते हैं। इस तरह हिंदू तीर्थ – यात्रियों, ऊंटों, व्यापारियों और विदेशी पर्यटकों का सम्मेलन बन जाता है जिसमें सिर्फ पशुओं का विनिमय ही नहीं बल्कि धार्मिक पुण्यो और सांस्कृतिक प्रतीकों की भी अदला – बदली होती है।

Q.5. ‘भूमंडलीकरण’ के तहत कौन-कौन सी प्रक्रियाएं सम्मिलित हैं?
Ans:भूमंडलीकरण के तहत समाचार और लोगों का संचलन, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वस्तुओं, पूंजी, अन्य आधारभूत सुविधाओं का विकास इत्यादि प्रक्रियाएं सम्मिलित है। भूमंडलीकरण का उद्देश्य दुनिया के चारों कोनों में बाजारों का विस्तार और एकीकरण को बढ़ाना है। भूमंडलीकरण के अंतर्गत सांस्कृतिक उत्पादों और छवियों का भी दुनियाभर में परिचालन होता है। यह विनिमय के नए दायरों से प्रवेश करती है और नए बाजारों का निर्माण करती है। उत्पाद, सेवाएं और संस्कृतिक तत्व जो पहले बाजार व्यवस्था से बाहर थे, अब भूमंडलीकरण के हिस्से हैं।

Q.6. ‘प्रतिष्ठा का प्रतीक’ क्या है?
Ans: ‘प्रतिष्ठा का प्रतीक’ का नाम समाजशास्त्र के महान संस्थापक मैक्स वेबर के द्वारा दिया गया। उनके अनुसार जो लोग वस्तुएं व अन्य सामान खरीदते हैं एवं उपयोग करते हैं, वह समाज में उनकी प्रस्थिति से गहनता से जुड़ा होता है। उदाहरणतया वे मध्य वर्गीय परिवार जिनके पास कोई कार का पुराना मॉडल है या कोई सेलफोन है तो इनके माध्यम से उनकी सामाजिक – आर्थिक प्रस्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है। वेबर का विचार था कि किस प्रकार लोगों की जीवन – शैली के आधार पर उनके वर्गों और प्रस्थित समूहों में भिन्नता आ जाती है।

Q.7. व्यापार की सफलता में जाति एवं नातेदारी संपर्क कैसे योगदान कर सकते हैं?
Ans: व्यापार की सफलता में जाति एवं नातेदारी संपर्क के लिए तमिलनाडु के नाकरट्टार एक जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। इनकी व्यापारिक गतिविधियों समुदाय के सामाजिक संगठनों से जुड़ी हुई थी। जाति, नातेदारी और परिवार की संरचना सब व्यापार के अनुकूल थी। नाकरट्टारों के बैंक भी संयुक्त परिवारिक संस्थान थे अर्थात् इनमें जाति एवं नातेदारी सभी का उचित सहयोग था। इसी प्रकार व्यापारिक और बैंकिंग गतिविधियां जाति और नातेदारी के माध्यम से संगठित थी। अतः जाति एवं नातेदारी संपर्कों द्वारा व्यापारिक गतिविधियां बढ़ाई जा सकती है। अतः बाजार की सफलता में जाति एवं नातेदारी संपर्कों का योगदान होता है।

Q.8. जनजातीय अर्थव्यवस्था के स्वरूप में क्या-क्या परिवर्तन आए?
Ans: जनजातीय अर्थव्यवस्था के स्वरूप में अनेक परिवर्तन आए हैं जो इस प्रकार है –
(i) दूरस्थ क्षेत्रों को धीरे – धीरे क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था से जोड़ दिया गया। यह सब कार्य औपनिवेशिक राज्यों के नियंत्रण में आने के बाद हुआ।
(ii) जनजातीय क्षेत्रों को सड़कों के निर्माण द्वारा स्थानीय लोगों के लिए खोला गया।
(iii) सड़कों के माध्यम से इन इलाकों के समृद्ध जंगलों और खनिजों तक पहुंचा गया। इससे इन क्षेत्रों में व्यापारी, साहूकार और आस – पास के गैर – जनजातीय लोगों की भी भीड़ उमड़ आई।
(iv) जंगल के उत्पादों को बाहरी लोगों को बेचा गया जिससे नई तरह की वस्तुएं व्यवस्था में शामिल हो गई।
(v) आदिवासियों को खदानों और बागानों में मजदूर के तौर पर रखा जाने लगा जो अंग्रेजी सरकार के दौर में स्थापित हुए।
इस प्रकार इन बदलावों से स्थानीय जनजातीय अर्थव्यवस्थाएं बड़े हजारों से जुड़ गई। इस प्रकार जनजातीय अर्थव्यवस्था में बदलाव आया।

Q.9.औपनिवेशिक काल के समय भारत की व्यापार में क्या स्थिति थी?
Ans: भारत में आर्थिक रूपांतरण उपनिवेशवाद के साथ ही प्रारंभ हुआ। औपनिवेशिकता के दौरान व्यवसायिक रुपये – पैसे की अर्थव्यवस्था के स्थानीय कृषि अर्थव्यवस्था में आने और विनिमय के वृहत् क्षेत्रों में उनके शामिल होने से ग्रामीण एवं नागरीय समाजों में सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तन हुए। उपनिवेश के पहले से भारत में उन्नत अवस्था के उत्पादन केंद्रों के साथ-साथ व्यापारियों का संगठित समाज, व्यापारिक तंत्र और बैंकिंग व्यवस्था भी शामिल थी जिससे भारत अन्य देशों से व्यापार करने में सक्षम था।

Q.10. बाजार पर समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण, आर्थिक दृष्टिकोण से किस तरह अलग है?
Ans:(i) समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण -इस दृष्टिकोण से समाजशास्त्री मानते हैं कि बाजार विशेष संस्कृतिक तरीकों द्वारा निर्मित है। ये विशेष प्रकार की सामाजिक संस्थाएं हैं। बाजारों का नियंत्रण या संगठन विशेष सामाजिक समूहों या वर्गों द्वारा होता है। बाजार की अन्य संस्थाओं सामाजिक प्रक्रियाओ और संरचनाओं में भी विशेष संबद्धता होती है। समाजशास्त्रियों के अनुसार अर्थव्यवस्थाएं समाज में बसी हुई है अर्थात बाजारों का समाजों में एक स्थान निर्धारित है व इनका समाज में आधिपत्य है।

(ii)आर्थिक दृष्टिकोण – इस दृष्टिकोण के अनुसार बाजार सुचारू रूप से तभी कार्य करते हैं जब खरीददार और विक्रेता तर्कसंगत निर्णय लेते है और ये निर्णय विक्रेता व दुकानदार दोनों के हितों में होते हैं। इसके अनुसार बाजार में हर व्यक्ति लाभानुसार निर्णय लेता है। इन्हीं निर्णयों के आधार पर ही समाज को फायदा होता है। इसके अनुसार खुला व्यापार हर प्रकार की राष्ट्रीय या अन्य रोकथाम से मुक्त होता है। आर्थिक दृष्टिकोण का अर्थ है कि बाजार के कार्यों में हस्तक्षेप न करके उसे अकेला छोड़ दिया जाए।

Bajar ek samajik Sanstha ke roop mein: दीर्घ उत्तरीय प्रश्न तथा उत्तर

Q.1. उदारवादिता कि विभिन्न नीतियों के बारे में बताइए व इसका उल्लेख कीजिए।
Ans: उदारवादिता की कई नीतियां हैं, जैसे – श्रम और व्यापार में सरकारी दखल कम देना, सरकारी विभागों का निजीकरण, पूंजी, विदेशी वस्तुओं के आसान आयात के लिए आयात शुल्क में कमी करना और विदेशी कंपनियों को भारत में उद्योग स्थापित करने में सहायता देना। उदारवाद के कार्यक्रमों के तहत जो परिवर्तन हुए, उन्होंने आर्थिक संवृद्धि को बढ़ाया। इन कार्यक्रमों के तहत भारतीय बाजार विदेशी कंपनियों के लिए भी खुला। अब भारत में ऐसी बहुत – सी वस्तुएं मिलती है। जो पहले यहां नहीं थी। उदारीकरण का असर मिश्रित रहा है। कई लोगों के अनुसार उदारीकरण का कुछ क्षेत्रों पर प्रतिकूल ही प्रभाव रहा है और भविष्य में भी ऐसा ही रहेगा। लोगों के अनुसार हम अपनी ज्यादा वस्तुएं खोकर कम वस्तुएं पाएंगे। सॉफ्टवेयर या सूचना तकनीकी, मछली पालन, फल उत्पादन जैसे कुछ उद्योग को उदारीकरण से फायदा हो सकता है, परंतु ऑटोमोबाइल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, और तेलीय अनाजों के उद्योग पर गहरा असर पड़ेगा, क्योंकि ये उद्योग विदेशी उत्पादकों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएंगे। उदाहरणतया, भारतीय किसान भारत की कृषि के उत्पादों का आयात करने के लिए व अन्य देशों के किसानों के उत्पादों से प्रतिस्पर्धा करने के लिए उत्पादन कर रहे हैं। किसानों के लिए जहां पहले सरकार खाद, उर्वरक, डीजल – तेल के दाम घटने को तैयार रहती थी, वही उदारवाद बाजार में इस तरह की कोई सरकारी मदद नहीं दी जाती। पहले भारतीय कृषि, सहायता मूल्य और सब्सिडी द्वारा विश्व बाजार से सुरक्षित थी। यह समर्थन मूल्य किसानों की न्यूनतम आमदनी को सुनिश्चित करता है, क्योंकि यह वह मूल्य था जिस पर सरकार कृषक उत्पादों को खरीदने को तैयार रहती हैं। परंतु उदारवाद बाजार में सब्सिडी समर्थन मूल्य को हटा लिया गया। इससे छोटे किसानों को रोजी-रोटी कमाने में भी कठिनाई हुई है।
निजीकरण से उन सरकारी विभागों के कर्मचारियों की भी नौकरी गई है, गैर – सरकारी असंगठित रोजगार उभरकर सामने आ रहे हैं और सरकारी संगठित विभागों में नौकरियां कम होती जा रही है। इस प्रकार उदारवाद के कारण हानि अधिक हुई है व इसका भारतीय जनता व अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।

Q.2. पूंजीवाद को एक सामाजिक व्यवस्था के रूप में समझाइए।
Ans: पूंजीवाद को मार्क्स के आधार पर समझा जा सकता है। कार्ल मार्क्स ने पण्य को उत्पादन या बाजार के लिए उत्पादन करने की व्यवस्था के रूप में समझा जो कि श्रमिक की मजदूरी पर आधारित है। मार्क्स ने लिखा है कि सभी आर्थिक व्यवस्थाएं समाधि व्यवस्थाएं सामाजिक अवस्थाएं भी है। हर उत्पादन विधि विशेष उत्पादन संबंधों से बनती है और वह एक विशिष्ट वर्ग – संरचना का निर्माण करती है। मार्क्स ने इस बात पर जोर दिया कि अर्थव्यवस्था लोगों के रिश्तो से बनती है न की चीजों से। ये रिश्ते उत्पादन की प्रक्रिया द्वारा एक-दूसरे से जुडे रहते हैं। पूंजीवाद उत्पादन विधि के अंतर्गत, मजदूरी व श्रम भी एक बिकाऊ वस्तु बन जाती है। इसका कारण है कि मजदूरों को अपनी श्रम शक्ति बेचकर ही अपनी अपनी मजदूरी अर्थात धन कमाना होता है। इस प्रकार दो आधारभूत वर्गों का गठन होता है –
(i) पूंजीपति वर्ग को उत्पादन के संसाधनों के मालिक होते हैं,
(ii) श्रमिक वर्ग जो अपना श्रम पूंजीपतियों को बेचते हैं।
पूंजीपतियों को इस व्यवस्था से मुनाफा होता है, क्योंकि वे श्रमिक वर्ग को उनके काम के बराबर पैसे नहीं देते हैं और उनके श्रम से अतिरिक्त मूल्य निकाल लेते हैं। पूंजीवाद के विकास से जीवन के हर क्षेत्र और हिस्सो में बाजारों का विस्तार हुआ। मार्क्स और पूंजीवाद के अन्य आलोचकों के अनुसार, पण्यीकरण की प्रक्रिया के नकारात्मक सामाजिक प्रभाव है। पण्यीकरण तब होता है जब कोई वस्तु बाजार में खरीदी या बेची न जा सकती हो और जब वह बाजार में बिकने वाली एक वस्तु बन गई है। जिसे – श्रम, कौशल ऐसी चीजें हैं जो खरीदी व बेची जा सकती है। पूंजीवाद समाज की अन्य महत्वपूर्ण विशेषता है कि उपभोग अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। आधुनिक समाजों में उपभोग एक महत्वपूर्ण तरीका है जिसके द्वारा सामाजिक विभिन्नता का निर्माण होता है और उन्हें प्रदर्शित किया जाता है।

Q.3. उपनिवेशवाद से आपका क्या तात्पर्य है? उपनिवेशवाद से पहले भारत की आर्थिक व्यवस्था को समझाइए।
Ans: उपनिवेशवाद एक ऐसी विचारधारा जिसके द्वारा एक देश दूसरे देश को जीतने और अपना उपनिवेश बनाने का प्रयत्न करता है। ऐसा उपनिवेश, उपनिवेशकर्ता देश का एक अधीनस्थ हिस्सा बन जाता है और फिर उपनिवेशकर्ता देश के लाभ के लिए उस उपनिवेश का तरह – तरह से शोषण करता है। उपनिवेशवाद साम्राज्यवाद से संबंधित है, परंतु उपनिवेशवाद के अंतर्गत उपनिवेशकर्ता देश उपनिवेश में बसने और उस पर अपना शासन बनाए रखने में अधिक रूचि लेता है , जबकि साम्राज्यवादी देश उपनिवेश को लूटकर उसे छोड़ देता है। यह दूर से ही उस पर शासन करता रहता है।
भारत प्राचीन ग्रामीण समुदायो का देश है जो अपेक्षाकृत स्वयं पर ही निर्भर थे। भारत की आर्थिक व्यवस्थाएं में प्राथमिक तौर पर गैर – बाजारी विनिमय के आधार पर संगठित थी। ओपनिवेशिकता ने भारत की अर्थव्यवस्था में बड़े आर्थिक रूपांतरण किए, परंतु ऐतिहासिक शोध के अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था का मुद्रीकरण औपनिवेशिकता से पहले ही विद्यमान था। बहुत से गांवों और इलाकों में विभिन्न प्रकार की गैर – बजारी विनिमय व्यवस्था थी। गांव विनिमय के बड़े तंत्र का हिस्सा थे जिससे कृषि उत्पाद और अन्य वस्तुओं का व्यापारिक प्रचलन होता था। उपनिवेश के पहले भारत में विस्तृत और परिष्कृत व्यापारिक तंत्र विद्यमान थे। भारत हस्तकरधा के कपड़ों का मुख्य निर्माता वस्तुओं जिनकी वैश्विक बाजार में मांग थी, का स्रोत था। भारत सूती कपड़े और महंगे रेशम का निर्यातक भी था। उपनिवेश के पहले के दिनों में भारत में उन्नत अवस्था के उत्पादन केंद्रों के साथ-साथ देशज व्यापारियों का संगठित समाज, व्यापारिक तंत्र और बैंकिंग व्यवस्था भी शामिल थी। पारंपरिक समुदाय या जातियों की अपनी कर्ज और बैंक की व्यवस्थाएं थी। इस प्रकार उपनिवेशवाद के बाद भारत के कुछ क्षेत्रों में परिवर्तन तो आए, परंतु उपनिवेश काल से पहले भी भारत एक समृद्ध राज्य था। भारतीय अर्थव्यवस्था का मुद्रीकरण ओपनिवेशिकता के ठीक पहले से विद्यमान था।

Q.4. किस तरह से एक बाजार जैसे कि, एक साप्ताहिक ग्रामीण बाजार, सामाजिक संस्था है?
Ans: यह तर्क उचित है कि साप्ताहिक ग्रामीण बाजार एक सामाजिक संस्था है। यह समाज से पूर्ण रूप से जुड़े होते हैं। साप्ताहिक बाजार गांवों के व्यक्तियों को सुविधाएं व उचित सामान उपलब्ध करवाता है। गांव के वे लोग जो अपनी उपज या अन्य किसी उत्पाद को बेचकर उन वस्तुओ को खरीदते है जो उन्हें गांवो में नही मिलती, साप्ताहिक बाजारों द्वारा एकत्रित कर लिए जाते है। इन वस्तुओ में गांवों से बाहर के विशेषज्ञ, जैसे – साहूकार, ज्योतिषी, मसखरे इत्यादि अपनी सेवाएं एवं वस्तुओ के साथ आते हैं। ये बाजार गांव के लोगो की उनकी जरूरतों का सामान उपलब्ध करवाते हैं। पहाड़ी इलाकों में जहां सड़के और संचार शीर्ण होता है, अधिवास दूर-दूर तक होता है और अर्थव्यवस्ता भी अपेक्षाकृत अल्पविकसित होते है। साप्ताहिक बाजार उत्पादो के आदान – प्रदान व व्यापार के साथ एक प्रमुख संस्था बन जाता है।
इन साप्ताहिक बजारो के स्वरूप में भी काफी परिवर्तन हुआ है। इन बाजारों का विकास अब धीरे – धीरे क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं में भी किया जाने लगा है। साप्ताहिक बाजारों का उत्तम उदाहरण बस्तर जिले का है। इनके साप्ताहिक बाजारों में व्यापारी गैर – जनजातीय, जनजातीय व बाहर से आए हुए हिंदू ही होते हैं। जंगल के उत्पाद जो आदिवासी लेकर आते हैं, वह व्यापारी खरीदकर कस्बों में ले जाकर उचित दामों पर बेच देते हैं। इन उत्पादों में गहने, बर्तन, नमक, हल्दी, बांस की टोकरी, इमली व तिलहन इत्यादि होते हैं। आदिवासी इन उत्पादों को बेचकर जो पैसा कमाते हैं, उसका उपयोग वे कपड़े व अन्य वस्तुओं की खरीददारी के लिए करते हैं। इस प्रकार साप्ताहिक बाजार चाहे ग्रामीण हो या जनजातीय इलाके, सबके लिए सामाजिक संस्था के रूप में कार्य करते हैं। इन्हीं बाजारों के माध्यम से ग्रामीण इलाके समाज से जुड़े रहते हैं।

Q.5. उपनिवेशवाद के आने के पश्चात भारतीय अर्थव्यवस्था किन अर्थों में बदली?
Ans: उपनिवेशवाद के आते ही भारतीय अर्थव्यवस्था गहरे अर्थों में बदली। इन बदलाव से उत्पादन व्यापार और कृषि में काफी कमी हुई। उपनिवेशवाद के कारण हस्तकरघा उद्योगों की समाप्ति हो गई व इन कामों का खात्मा हो गया। इसका प्रमुख कारण यह था कि भारत में इंग्लैंड से सस्ते बने कपड़ों को बाजारों में बेचा गया जिससे हस्तकरघा उद्योग बंद ही हो गए। ज्यादातर इतिहासकार उपनिवेश काल को एक संधिकार के रूप में देखते हैं। औपनिवेशिक काल के दौरान भारत विश्व की पूंजीवादी अर्थव्यवस्था से और अधिकता से जुड़ गया। जहां भारत पहले सिर्फ निर्मित वस्तुओं के निर्यात का प्रमुख केंद्र था, वही उपनिवेशवाद के पश्चात कच्चे माल और कृषक उत्पादों का स्रोत और उत्पादित सामानों का उपभोक्ता बन गया। नए – नए समूह व्यापार और व्यवसाय में आने लगे। इन समूहों ने पहले के व्यापारिक समुदायों से मिल – जुलकर अपना व्यापार शुरू किया या कभी इन समुदायों द्वारा उनका व्यापार छोड़ने पर। इन कार्यों के द्वारा नए व्यापारी समूहो ने अपनी सत्ता व प्रभुत्व भारत में स्थापित किया। परंतु पहले से विद्यमान आर्थिक समुदायों को नए अवसर भी प्रदान किए गए जिससे इन समुदायों ने अपनी आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को पुनर्गठित किया व अपनी स्थिति को सुधार। कुछ नए समुदायों की भी उत्पत्ति हुई जिन्होंने स्वतंत्रता के पश्चात भी अपनी आर्थिक शक्ति को निरंतर बनाए रखा। मारवाड़ी जो शायद भारत में हर जगह पाए जाने वाले सबसे प्रचलित व्यापारिक समुदाय हैं, उपनिवेश काल के दौरान एक सफल समुदाय बने। उन्होंने ओपनिवेशक शहरों जैसे – कलकता में मिलने वाले अवसरों का लाभ उठाया और व्यापार साहूकारी जारी रखने के लिए देश की सभी भागों में बस गए। उपनिवेश के आखिरी दिनों में भी मारवाड़ी परिवारों ने अपने -आपको आधुनिक उद्योगों में रूपांतरित कर लिया। मारवाड़ीयों की सफलता गहन – समाजिक तंत्रों की वजह से है जिसने उनकी बैंकिंग व्यवस्था के संचालन के लिए भरपूर संबंधों की स्थापना की। उपनिवेश काल के दौरान एक नए व्यापारिक समुदाय का उभरकर आना आर्थिक प्रक्रियाओं में सामाजिक संदर्भ के महत्व को दर्शाता है। अतः उपनिवेश काल के पश्चात भारतीय अर्थव्यवस्था में छोटे व बड़े परिवर्तन आए।

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